Lenin Media | Articles | China Talk - Real Meaning by Sh. Jitendra Kumar Tripathi
 
 
 
Article

चीन-की-चतुष्पक्षीय-वार्ता-के-असली-मायने

विगत २६ जुलाई को चीन के विदेश मंत्री ने चार दक्षेस देशों की एक वर्चुअल बैठक बुलाई । इस बैठक में चीन, नेपाल, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री शामिल हुए । इस बैठक का प्रत्यक्षतः उद्देश्य था कोरोना महामारी से निपटने के तरीकों पर विचार करना किन्तु प्रच्छन्न उद्देश्य कुछ और ही था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार इस बैठक में चारों देशों में कोरोना से निपटने के तरीकों के आलावा कनेक्टिविटी, व्यापार और चीन की महत्वाकांक्षी योजना बी. आर. आई. (बॉर्डर रोड इनिशिएटिव) पर भी बात हुई

किन्तु इस बैठक का समय, उद्देश्य और सम्मिलित देशों का चयन चीन की नीयत पर कुछ बड़े प्रशनचिन्ह पैदा करता है। यदि चीन का वास्तविक उद्देश्य कोरोना से निपटने के उपायों पर ही विमशु करना था तो यह बैठक पहले क्यों नहीं बुलाई गयी, जब महामारी का प्रसार हो ही रहा था और चीन इसको रोकने में कामयाबी का दावा कर रहा था। आखिर चीन ने महामारी के बढ़ने की इतनी प्रतीक्षा क्यों की ? दूसरा अहम् सवाल यह है कि दक्षिण एशिया में ही नहीं, सम्पूर्ण एशिया में चीन के बाद भारत ही जनसंख्या, क्षेत्रफल और अर्थव्यवस्था के हिसाब से सबसे बड़ा देश है। एशिया में भारत में ही कोरोना संक्रमण सबसे अधिक है, फलतः इसको पहचानने और लड़ने के तरीके भी अधिक हैं । अतः भारत इस बैठक में एक सकारात्मक योगदान दे सकता था और यह स्मरण रहे कि भारत ने ही पहले दक्षेस देशों की बैठक कोरोना पर बुलाई थी, ऐसी स्थिति में भारत को इस बैठक से जानबूझ कर बाहर रखना बैठक के उद्देश्य को संदिघ्ध बना देता है। फिर दक्षिण एशिया में बांग्ला देश भी है जहां कोरोना संक्रमण के मामले पाकिस्तान के लगभग बराबर ही हैं, लेकिन बांग्लादेश को नहीं बुलाया गया।

दरअसल इस बैठक का समय ही बता देता है कि इसे बुलाने का वास्तविक उद्देश्य क्या था। वर्तमान समय में चीन विश्व जनमत की आलोचना कई मोचों पर झेल रहा है । तिब्बत, मशंगक्जआंग और हांगकांग में मानवाधिकारों का हनन, संयुक्त राज्य अमेरीका की आर्थिक नाकाबंदी, भारत से सीमा पर अतिक्रमण का विवाद और आर्थिक बहिष्कार तथा दक्षिण चीन सागर में समप्रभुता को लेकर क्षेत्र के देशों से विवाद के कारण चारों ओर से घिर चुके चीन को अपनी बी. आर. आई. योजना का एशिया में सबसे महत्वपूर्ण भाग "चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा संकट में पड़ता नज़र आ रहा है। चीन का पिछलग्गू पाकिस्तान तो भारत के सदैव ही विरुद्ध रहा है और अब चीन की शह पर नेपाल भी भारत को आँखे दिखा रहा है। भारत ने चीन की बी. आर. आई. योजना में शामिल होने से इसलिए इंकार कर दिया था क यह गलयारा पाक अधीकृत कश्मीर से गुजरता है जो भारत का अंग है। भारत द्वारा प्रस्तावित ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास और उसे अफ़ग़ानिस्तान से सड़क मार्ग से जोड़ने की योजना से चीनी गमलयारे को नुक्सान होगा। इसीलिए ये चीन नेपाल और पाकिस्तान के अंतर्गत अफ़ग़ानिस्तान को भी ललचाना चाहता है ताकि भारतीय योजना कहते में पड़ जाए।

इसके अतिरिक्त चीन का यह भी उद्देश्य है कि उत्तर पश्चिम से भारत को रणनीनतक रूप से घेर लिया जाए। हिन्द महासागर में श्रीलंका में चीनी नौसेना के पोतों के रुकने की छूट चीन ने ले ही ली है। इस तरह से भारत को तीनों और से घेर कर रणनीतिक दबाव बनाने की योजना चीन की है। इसी उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए चीन ने यह बैठक बुलाई और बहाना बनाया कोरोना का। कहा जाता है चीन ने अफ़ग़ानिस्तान को काफी प्रलोभन दिए। अभी तक अफ़ग़ानिस्तान ही इस क्षेत्र में एक ऐसा देश था जहां चीन की नज़र ज़्यादा नहीं पड़ी थी, लेकिन पिछले कुछ समय से चीन को अफ़ग़ानिस्तान का भू-रणनीतिक महत्व दिख गया है। फिर अफ़ग़ानिस्तान में वृहत मात्रा में खनिज सम्पदा की सम्भावना ने चीन के लालच को हवा दी है।

चीन के अफ़ग़ानिस्तान के प्रति रुझान का यह एक दूसरा कारण है। अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सी. आई. ए. की एक रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में निश्चित रूप से लगभग 10 खरब डॉलर की बहुमूल्य खनिज सम्पदा दबी हुई है जिसमे सोना, कोबाल्ट, लोहा, तांबा और लिथियम के खनिज हैं | इस सम्पदा का मूल्य लगभग 30 खरब डॉलर तक भी जा सकता है जो भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बराबर है ! अब चूंकि निर्धन अफ़ग़ानिस्तान के पास ऐसे आधुनिक संसाधन नहीं हैं जिससे इस समपदा का आर्थिक दोहन किया जा सके, चीन की मंशा अफ्रीकी देशों की भांति अफ़ग़ानिस्तान को विकास के नाम पर कर्ज देकर बदले में खनिज सम्पदा के दोहन का अधिकार ले लेने की है। इससे चीन को मोबाइल फ़ोन और बबजली की कारों की बैटरी के लिए बहुमूल्य लिथियम की निर्बाद पूर्ति हो जाएगी। चीन पाकिस्तान और नेपाल को तो अपने कर्ज के जाल में फंसा ही चुका है, अब अफ़ग़ानिस्तान की बारी है | 26 जुलाई की इस बैठक में चीनी विदेश मंत्री ने तो अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान से सीख लेने की भी सलाह दे डाली |

देखना यह है की इस बैठक का क्या प्रभाव पड़ता है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वह तो पूरी तरह चीन के चंगुल में है, यहां तक कि इस 64 अरब डॉलर के आर्थिक गलियारे की परियोजनाओं कि धीमी चाल और सिर्फ दो विद्दुत परियोजनाओं में उजागर हुए 1.5 अरब डॉलर के घोटाले के बावजूद पाकिस्तान चीन के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रखता । नेपाल पर चीन का शिकंजा अभी धीरे-2 कस रहा है हालांकी वहाँ चीन के विरोध में भी आवाजें भी उठनी शुरू हो गयी हैं। अफ़ग़ानिस्तान में भारत का परंपरागत प्रभाव और निवेश तथा अमेरिका के शांति प्रयासों के चलते तो नहीं लगता कि अफ़ग़ानिस्तान निकट भविष्य में चीन के प्रभाव में आ सकता है।