Lenin Media | एक युद्ध है नशा के अवैध बाजार से लड़ना | Article by Shri Sarvesh Tiwari | Lenin Media
 
 
 
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एक युद्ध है नशा के अवैध बाजार से लड़ना


नशे की ज्यादातर शुरुआत घर से ही होती है। घर का कोई सदस्य जब नशा करता है तो उसे बच्चे देखते हैं और उनका अनुकरण करते हैं। अगर हमारा कोई 'आदर्श' ही नशेड़ी हो तो स्वाभाविक है उसकी एक गलती कई घरों को तबाह करने के लिए काफी है। शेखी के चक्कर में ही नशे का प्रचार हो रहा है। अक्सर देखा गया है कि नशा करने के बाद लोग अपराध करते हैं। चाहे वो बंद कमरे में हो या खुले बाजार में। वर्ल्ड हेल्थ और्गेनाइजेशन के आंकड़ों की माने तो दुनियाभर में सड़कों पर रहने वाले 90% से ज्यादा बच्चे किसी न किसी तरह के नशे की गिरफ्त में हैं। वहीं एक आंकड़ा बताता है कि देश में हर 5 में से 1 ड्रग एडिक्ट 18 साल से कम उम्र का है। कमाल की बात है हम जानते समझते सब हैं लेकिन खुद पर अमल नहीं करते। सच तो ये है कि नशे कि गिरफ्त में एक देश या वर्ग नहीं है बल्कि हर फिल्ड में इसके दीवाने मिल जायेंगे। अफीम, गांजा, हेरोइन, कोकीन, चरस ये वो नाम हैं जिसने शराब और सिगरेट को छोटा कर दिया है।

एशिया या यूरोप ही नहीं अफ्रीका के कुछ देशों में इसकी लत इतनी है कि पूरी युवा पीढ़ी को खोखला बना रही है। मॉरिशस में एक शिक्षित परिवार के मुखिया ने बताया कि कैसे दक्षिण अफ्रीका में उनके परिवार के दो बेटे नशे की भेंट चढ़ गए। वहां नया ड्रग कॉकटेल 'न्याओपे' मौत का सबब बना हुआ है। न्याओपे एक सफ़ेद पाउडर होता है जिसमें सस्ती हेरोइन के साथ कुछ चीज़ें मिली होती हैं, जैसे कि चूहे मारने की दवा और कई दफ़ा एचआईवी मरीज़ों की दवा को पीसकर इसमें मिला दिया जाता है। जब इसे मारिजुआना पर छिड़का जाता है तो इसका नशा कहीं ज़्यादा गुलाम बनाने वाला होता है, ज़िंदगी को बर्बाद करने की हद तक। यमन,सोमालिया,दक्षिण सूडान और नाइजीरिया में तो और भी बुरा हाल है।

मौजूदा समय में दुनिया भर में हेरोइन की कुल खपत करीब 340 टन है , जबकि 430 से 450 टन इसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जब्त किया जाता है। खास बात ये है कि कुल मॉर्फीन (अफ़ीम का सत्त्व) में 50 टन हिस्सेदारी म्यांमार और दक्षिण पूर्व एशिया के देश लाओस की है। बाकि 380 टन हेरोइन और मॉर्फीन अफगानिस्तान से तैयार होकर दूसरे देशों तक पहुंचता है। हैरत की बात तो ये है कि महज 5 टन ही सही जगह इस्तेमाल या जब्त होता है,375 टन अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों से होते हुए नशे के गैर क़ानूनी बाजार में चला जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में जब्त की जाने वाली कुल हेरोइन का 39 फीसदी हिस्सा पूर्व और दक्षिण पश्चिम एशिया का होता है। दक्षिण पूर्व यूरोप में 24 प्रतिशत और पश्चिम सेन्ट्रल यूरोप में 10 फीसदी है।

मॉर्फीन एक ऐल्केलॉइड है जो अफीम से ही तैयार होता है। इसका इस्तेमाल हाइड्रोक्लोराइड, सल्फेट, एसीटेट, टार्ट्रेट और अन्य रूप में होता है। अब ये दवा से ज्यादा नशा के लिए काम आने लगा है। मॉरफीन से दर्द दूर होता है और गहरी नींद आती है। यही वजह है कि इसकी लत लगने के बाद इंसान इसका इंजेक्शन लेने लगता है जिसका तुरंत असर होता है। कहने को तो दवा निर्माता कंपनियों को ही इसकी तय मात्रा में खरीद और तैयार दवा को बेचने का अधिकार है, लेकिन हकीकत ये है कि स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे बेधड़क ऐसी दवाएं मेडिकल स्टोर या सुपर मार्केट में मिल जाती हैं।

ड्रग्स का इस्तेमाल शुरू से ग्लोबल मार्केट में चोरी छिपे कोड वर्ड के जरिये होता रहा है। 1970 और 80 के दशक में अमेरिका में पिज़्ज़ा के नाम पर घर - घर ड्रग्स की सप्लाई का जब भंडाफोड़ हुआ तो नशे के गैर क़ानूनी बाजार का सच सामने आया। नशा माफिओं के एक संगठन कासा नोस्त्रा से जुड़े 38 लोगों को अप्रैल 1984 में पिज्जा पार्लर के जरिये हेरोइन और गांजा सप्लाई करने का दोषी पाया गया था। हालही में लॉकडाउन के दौरान भी माफिया पिज्जा बॉक्स के भीतर ड्रग्स और हथियार रख कर अपने कस्टमर के घर कूरियर बॉय से पहुंचाते पकड़ें गए। इंटरपोल ने खुलासा किया है कि ब्रिटेन, आयरलैंड, मलेशिया और स्पेन में पिज्जा बॉक्स के भीतर ड्रग्स की सप्लाई ज़ोरों पर है। कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जब तमाम देशों की सरकारों ने सारे कामकाज पर रोक लगा रखी थी और कारोबार प्रतिष्ठान बंद थे तब भी ड्रग माफिओं का धंधा ठप नहीं हुआ। लॉकडाउन के बावजूद ड्रग्स और अवैध हथियारों की बिक्री में कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है।

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन, मलेशिया और स्पेन में टेक-अवे फूड डिलीवरी के नाम पर कूरियर बॉय फूड बॉक्स के भीतर कोकीन, मारिजुआना और केटामाइन रख कर बाइक, मोटरसाइकिल और कार से डिलीवरी कर रहे हैं। इस सप्लाई के जरिए कूरियर बॉय भी भारी मुनाफा कमा रहे हैं। आयरलैंड पुलिस ने डबलिन में 430000 यूरो की कीमत की कोकेन बरामद की तो कूरियर बॉक्स के भीतर से दो पिस्तौलें मिलीं।

इंटरपोल पुलिस का कहना है कि कुछ डिलीवरी बॉय अनजाने में ये काम कर रहे हैं और उन्हें नहीं मालूम कि पिज्जा बॉक्स के भीतर क्या रखा गया है। ये राज तब फाश हुआ जब मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में एक मामले में खुद पिज्जा डिलीवरी बॉय ने पुलिस से संपर्क कर डिलीवरी बॉक्स की तलाशी लेने को कहा ,क्योंकि उसे मामला संदेहास्पद लग रहा था।

अपने देश में भी नशे का कारोबार पड़ोसी देश पाकिस्तान के रास्ते होता है। पेशावर, कराची और क्वेटा से ड्रग्स माफिया अपना माल मुंबई और दिल्ली भेजते हैं। हालांकि पिछले कुछ वक़्त से पाकिस्तान की ये कोशिश कामयाब नहीं हो पारही है। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के युवाओं को नशे की लत में डालने में पाकिस्तान का बड़ा हाथ रहा है। वाबजूद इसके भारत ने कभी भी नशे के अवैध कारोबार को पनपने नहीं दिया। भारत में अफीम की खेती मुगल शासक अकबर के समय सन 1556 से 1605 में शुरू हुई। उस समय उत्तर भारत में खेती की जाती थी। 1773 में ब्रिटिश शासन ने इसे कब्जे में ले लिया। आजादी के बाद 1950 में नारकोटिक्स विभाग जब बना तब ये तमाम शर्तों और कानून के दायरे में आ गया। अफीम में 12 फ़ीसदी तक मार्फीन पायी जाती है, लम्बी प्रक्रिया के बाद इससे हेरोइन तैयार की जाती है।

ड्रग्स के इस्तेमाल या बढ़ावा के लिए कोई एक राज्य या वर्ग जिम्मेदार नहीं है, वो लोग भी उतने ही कसूरवार हैं जो निहित स्वार्थों के लिए अपनी आखों के सामने इसे पनपने दे रहे हैं। लेकिन वो ये भूल गए हैं कि एक दिन उनके परिवार का सदस्य भी इसकी चपेट में जरूर आएगा। क्योंकि समाज को जो हम देते हैं वही समाज से हमें वापस मिलता है।