Baal Jagat | कथा | कहानी

बालक ध्रुव

प्राचीनकाल की बात है। उस काल के एक राजा हुए हैं, स्वायंभुव मनु स्वायंभुव मनु बहुत पराक्रमी राजा थे उनकी दो सन्तान थीं । प्रियव्रत तथा उत्तानपाद उत्तानपाद का शाब्दिक अर्थ होता है, पांव फैलाया हुआ सचमुच उत्तानपाद 'यथा नाम तथा गुण वाली कहावत को चरितार्थ करते थे। वे एक साथ दो घोड़ों पर सवारी करते थे उनका एक पैर एक घोड़े की पीठ पर रहता था तो दूसरा पैर दूसरे घोड़े की पीठ पर

उत्तानपाद की दो पत्नियां थीं। उनमें से एक का नाम था सुरुचि तथा दूसरी का नाम सुनीति राजा उत्तानपाद को सुरुचि से ज्यादा प्रेम था । यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि राजा को आरम्भ से ही अच्छी चीजों में रुचि थीवैसे प्रेम वे सुनीति से भी करते थे, किन्तु सुरुचि और सुनीति में अन्तर तो होना ही था!

__सुरुचि, यानी अच्छी रुचि मनुष्य का गुण ही तो होता है अच्छी रुचि वाले को गन्दगी पसन्द नहीं होती, स्वास्थ्यकर भोजन से भी उसको प्रेम होगा, उसमें शिष्टता और विनम्रता होगी। साहित्य, संगीत और कला से उसको प्यार होगा, परन्तु इसी के बल पर तो मनुष्य वैतरणी पार नहीं कर सकता। उसके लिए तो कठिन साधना की आवश्यकता होती है और आवश्यकता होती है सुनीति की प्रेय भले ही प्रिय लगे, पर श्रेय तो श्रेय में ही है। सुरुचि प्रेय हो सकती है, पर श्रेय तो सुनीति ही है । सुरुचि में कोई जोखिम नहीं है, पर सुनीति पर चढ़ना तो खांडे की धार पर चलने के समान हैसुरुचि में जिन्दगी भले ही चैन से कट सकती हो, पर सुनीति के चाहने वाले को तो अपने सिद्धान्तों के लिए मर-मिटना ही पड़ता है, किन्तु राजा उत्तानपाद तो दो घोड़ों पर एक साथ सवारी करना चाहता था, इसलिए यद्यपि सुरुचि और सुनीति दोनों ही उसकी पत्नियां थीं, तथापि सुरुचि के प्रेम में फंसकर उसका पैर ढीला हो गयाफल यह हुआ कि राजा का आकर्षण सुरुचि की सन्तान के प्रति बढ़ता गया, सुनीति की सन्तान ध्रुव के प्रति उसके मन में उदासीनता आ गई।

सुरुचि के पुत्र का नाम था उत्तम । राजा को उत्तम भोजन, उत्तम वस्त्र, उत्तम कला और उत्तम संगीत का प्रेम अपनी ओर खींचता था और सुनीति की सन्तान ध्रुव, जो अचल है, शाश्वत है, जो सत्य है, उससे राजा को उदासीनता हो गईराजा के इस एकपक्षीय प्रेम का बड़ा दुष्परिणाम निकला, जो आगे चलकर एक कभी न भूलने वाला प्रकरण बनकर रह गया।

हुआ ये कि एक बार जब राजा उत्तानपाद अपने राजमहल में बैठे हुए थे तो बालक ध्रुव कहीं से खेलता हुआ उनके निकट आ पहुंचा और उसने अपने पिता की गोद में बैठना चाहाउस समय राजा की गोद में सुरुचि का पुत्र उत्तम बैठा हुआ था। राजा ने ध्रुव से कहा, “पुत्र ध्रुव! तुम अभी थोड़ा और बाहर जाकर खेलो, अभी मेरी गोद में उत्तम बैठा हुआ है।"

रानी सुरुचि भी उस समय वहीं खड़ी थी। उसने पांच वर्ष के बालक ध्रुव की ओर उपेक्षा भरी दृष्टि डालते हुए मुंह बिचकाकर कहा, “अरे अभागे! तुम्हें पिता की गोद में बैठना था तो पूर्व जन्म में तपस्या करके मेरे गर्भ से जन्म लिया होता।"

___ बात बेहद तीखी थी, बालक ध्रुव के हृदय को बेध गई उसे अपने पिता तथा विमाता के व्यवहार से भारी ठेस पहुंचीवह रुआंसा हो गया और दुखी मन से अपनी माता सुनीति के पास जा पहुंचा । ध्रुव की माता सुनीति ने जब अपने बेटे को उदास और रुआंसा देखा तो प्यार से पुचकारकर अपनी गोद में बैठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “पुत्र! क्या बात है, तुम इतने उदास और रुआंसे से क्यों हो?"

मां का प्यार पाकर ध्रुव का गला भर आयाउसने पिता के उपेक्षित व्यवहार और विमाता द्वारा मारे गए ताने की बात अपनी माता को बताईध्रुव की बात सुनकर सुनीति की आंखों से भी दुख के आंसू बहने लगे

ध्रुव ने कहा, “मां! रोओ मत अब मैं यहां नहीं रहूंगामैं अब पिता की गोद से भी बड़े आसन पर बैठने की योग्यता प्राप्त करूंगामैं वन में जाऊंगा और भगवान से प्रार्थना करूंगा कि मेरी माता की कोख को विमाता की कोखा से ज्यादा प्रतिष्ठित करे ।"

___मां रोकती रही, किन्तु ध्रुव नहीं माना घर छोड़कर वह जंगल की ओर चल पड़ारास्ते में उसे नारद मुनि मिल गएध्रुव को इस प्रकार अकेले जाते देखा तो उन्होंने पूछा, "राजकुमार ध्रुव! तुम अकेले जंगल की तरफ कहां जा रहे हो?"

ध्रुव बोला, “मुनिवर! मेरे पिता ने मेरा तथा मेरी विमाता ने मेरी माता का बडा अपमान किया हैमैं भगवान से कहने जा रहा हूं कि इस अपमान के दुख से बचाकर हम दोनों को प्रतिष्ठा दें।

" बालक ध्रुव की बातें सुनकर नारद ने कहा, “ध्रुव! तुम अभी बालक हो तप, पूजा की विधि तुम्हें नहीं आती थोड़ा और बड़े हो जाओ तब ऐसा संकल्प करना ।"

ध्रुव बोला, “मुनिराज! मैं एक क्षत्रिय राजा का पुत्र हूं। मुझमें रजोगुण है। मैं अपना अपमान सहन नहीं कर सकतामैं अब तभी लौटूंगा जब अपना संकल्प पूरा कर लूंगा।"

"सुनो ध्रुव!” नारद ने स्नेह से समझाया, "तुम्हें यदि मान-अपमान का विचार है तो भी मनुष्य के असन्तोष का कारण मोह के सिवा कुछ नहीं होता. क्योंकि मनष्य अपने कर्मानसार ही इस लोक में मान-अपमान या सुख-दुख आदि की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के वशीभूत रहता हैअतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि भगवान की विचित्र गति देखकर दैववश उसे दुख या सुख, आदर अथवा अनादर जो भी प्राप्त हो, उसी में सन्तुष्ट रहे।"

नारद ने आगे समझाया, “वत्स ध्रुव! मनुष्य को चाहिए कि वह अपने से अधिक गुणवान को देखकर प्रसन्न हो, गुण में अपने से न्यून को देखकर उस पर दया करे और जो अपने समान गुणी हो, उससे मित्रता का भाव रखेऐसा करने से वह कभी सन्तप्त नहीं होगा।"

शिक्षा अच्छी थी, किन्तु वह ध्रुव को अपने मार्ग से विचलित न कर सकीध्रुव समझ गया कि नारद के कहने का आशय सिर्फ इतना ही है कि सिर्फ आवेश में आकर कुछ करने पर उतारू हो जाना ठीक नहीं हैअतः उसने नारद से कहा, “मुनिवर! मेरे मन में अपने पिता एवं विमाता के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है मैं उनका कोई अहित नहीं चाहता। हां, उनके व्यवहार से मेरे मन को जो ठेस पहुंची है, मैं भगवान से उसका निराकरण अवश्य चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मुझे अपने पिता की गोद से भी ऊंचा स्थान प्राप्त होमैं यह भी चाहता हूं कि मेरी माता को प्रतिष्ठित पद प्राप्त हो, इसलिए मैं प्रभु की शरण में जा रहा हूं।"

नारदजी ने जब ध्रुव को अपने संकल्प पर दृढ़ देखा तो उन्होंने उसे आशीर्वाद दे दिया, साथ ही उसे प्रभु-उपासना की पद्धति भी समझा दी।

ध्रुव चला गया । यमुना तट पर मधुवन में एक सुरम्य स्थान पर उसने तप किया बालक ध्रुव के दृढ़ निश्चय तथा आत्म-सम्मान के लिए किए गए तप से भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ध्रुव के समक्ष प्रकट होकर उसने सिर पर हाथ रखाकर आशीर्वाद दिया, "वत्स ध्रुव! उठो, तुम्हारी तपस्या पूरी हो गई है। इतनी छोटी अवस्था में ऐसा दृढ़ संकल्प करके मेरी तपस्या करने वाले तुम प्रथम तपस्वी हो बोलो क्या वरदान मांगना चाहते हो?"

ध्रुव क्या उत्तर देता! भगवान विष्णु द्वारा उसके सिर पर हाथ रख देने मात्र से ही उसकी तो सारी मनोकामनाएं जैसे पूरी हो गई थीं वह तो बस एकटक भाव से हाथ जोड़े उनके मुख की ओर देखता रहा।

भगवान विष्णु पुनः बोले, “बताओ ध्रुव! क्या चाहते हो? तुम चाहो तो मैं तुम्हें ऐसा वरदान दे सकता हूं, जो अब तक न तो किसी को मिला है और न भविष्य में किसी को मिलेगा ही।"

ध्रुव बोला, “प्रभो! मेरे पिता ने मुझे अपनी गोद में बैठाने से मना कर दिया और विमाता ने मेरी माता की कोख का अपमान किया, इसी कारण मुझे तप करना पड़ाआप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं मांगता, आप अन्तर्यामी हैं, सबके मन की बात जानते हैं। आप स्वयं ही जो दे देंगे, मुझे वही स्वीकार्य होगा।"

भगवान विष्णु बोले, "वत्स ध्रुव! अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हारे पिता और तुम्हारी विमाता को अपने व्यवहार पर बहुत दुख हैतुम्हारी माता भी तुम्हारे वियोग में बहुत दुखी हैपिता ने तुम्हें अपनी गोद में नहीं बैठाया, पर अब वे तुम्हें राज सिंहासन पर बैठाकर अपनी भूल का प्रायश्चित करेंगे और तुम्हें राज-पाट सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम में चले जाएंगेमैं तुम्हें तुम्हारी मृत्यु के पश्चात् एक ऐसा अटल पद दूंगा जो अब तक किसी को नहीं मिला । समस्त लोकों तथा नक्षत्र मण्डलों में तुम्हारा स्थान सबसे ऊंचा होगा सारे ग्रह-नक्षत्र तथा सप्तर्षि तुम्हारी परिक्रमा करेंगे तुम सर्वोच्च पद पर स्थिर रहोगे तुम्हारा लोक ध्रुवलोक के नाम से विख्यात होगा।"

फिर ठीक वैसा ही हुआ जैसा प्रभु ने कहा थाध्रुव घर लौटा तो राजा उत्तानपाद उसे राजपाट सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम में चले गए।

ध्रुव राजगद्दी पर आसीन होकर प्रजा के कल्याण में लग गए। फिर ऐसा हुआ कि राजकुमार उत्तम एक रोज वन की तलहटी में शिकार खेलने गया । वहां यक्षों ने उसे कत्ल कर डाला । पीछे से सुरुचि उसे खोजने निकली तो वह भी जंगल की आग में जलकर भस्म हो गई।

ध्रुव ने अनेकों वर्ष कुशलतापूर्वक प्रजा के सहयोग से शासन का कार्य किया और जब उसकी आयु पूरी हो गई तो शरीर को त्याग कर वे सीधे बैकुण्ठलोक में पहुंच गए। वे आज भी ध्रुव तारे के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान हैं और रात्रि के अन्धेरे में राह भूले पथिकों को दिशा का सही ज्ञान दे रहे हैं

ध्रुव की कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति के संकल्प में यदि दृढ़ता हो, उसके उद्देश्य में निष्ठा हो तो उसे ऐसी ही स्थायी सफलता मिलती है

बाल जगत