बाल - जगत | कथा | कहानी

बुद्धिमान तित्तिर

पूर्व समय में हिमालय के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ था। उस पेड़ का आश्रय लेकर तीन मित्र रहा करते थे-तित्तिर, बानर और हाथी।

लेकिन वे तीनों न एक साथ मिलकर रहते थे, न एक दूसरे का आदर करते थे, न सत्कार करते थे, न एक साथ जीविका करते थे। तब उनके मन में यह विचार हुआ, "हमारे लिए इस प्रकार रहना उचित नहीं है। हमें आपस में मिलना-जुलना चाहिए। जो हम लोगों में बड़ा है, उसका प्रणाम आदि सत्कार करना चाहिए।"

उस दिन से तीनों आपस में मिलने लगे। फिर उनके बीच एक प्रश्न उठा कि कौन सबसे जेठा है? इस बात का फैसला करने के लिए तीनों मित्र बढ़ के नीचे बैठे। वहां बैठने पर तित्तिर और बानर ने हाथी से पूछा, "सौम्य हाथी! तु इस वृक्ष को किस समय से जानता है?"

"मित्रो। जब मैं बच्चा था तो इस बरगद के वक्ष को जांघ के बीच करके लांघ जाता था। जब जांघ के बीच करके खड़ा होता था तो इसकी फुनगी मेरे पेट को छूती थी। सो मैं इसके गाछ होने के समय से जानता हूं।"

हाथी के जवाब दे चुकने पर तित्तिर और हाथी ने बन्दर से वही प्रश्न किया। बन्दर बोला, "मित्रो! जब से मैं बच्चा था तो भूमि पर बैठकर, बिना गर्दन उठाए, इस बरगद की फुनगी के अंकुरों को खाता था। सो मैं इसे छोटा होने के समय से जानता हूं।"

वही प्रश्न तित्तिर के सामने दुहराया गया। वह बोला, "मित्रो! अमुक स्थान पर एक बरगद का पेड़ था। मैंने उसके फल को खाकर इस स्थान पर बीट कर दी। उसी से यह वृक्ष पैदा हुआ। इस प्रकार इसे मैं उस समय से जानता हूं, जब यह पैदा ही नहीं हुआ था।"

ऐसा कहने पर बन्दर और हाथी ने तित्तिर पण्डित को कहा, "मित्र तू हममें जेठा हैइसलिए अब से हम तेरा सत्कार करेंगे, अभिवादन करेंगे तथा तेरे उपदेशानुसार चलेंगे।

अब से तुम हमें उपदेश देना और अनुशासन करना।" उस समय से तित्तिर उन्हें उपदेश देने लगा तथा अनुशासन करने लगा।

इस प्रकार वे पशु-योनि के प्राणी आपस में एक-दूसरे का आदर-सत्कार करते हुए जीवन के अन्त में देव-लोकगामी हुए।

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