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स्वर्ण हंस

पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त नामक राजा राज्य करता था। उस समय बोधिसत्व एक ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। जब वे बड़े हुए तो उनके समान जाति-कुल से एक भार्या ला दी गई। उससे उन्हें नन्दा, नन्दवती और नन्द-सुन्दरी तीन लड़कियां पैदा हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्व का देहांत हो गया और वह स्वर्ण-हंस बनकर पैदा हुए।

'हंस' ने बड़े होने पर सोने के परों से ढके हुए परम सौभाग्यवान अपने शरीर को देखकर विचार किया कि मैं कहां से मरकर यहां पैदा हुआ हूं? उसे मालूम हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लड़कियों का जीवन-पालन कैसे होता है? उसे पता लगा कि दूसरों की मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती हैं। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस (कटे और रगडे जा सकते हैं) हैं। इनमें से एक-एक पर उन्हें दूंइससे मेरी भार्या और लड़कियां सुखपूर्वक जीएंगी।

हंस ब्राह्मणी के घर पहुंचकर घर के शहतीर के एक सिरे पर जा बैठा। ब्राह्मण और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा, “स्वामी! कहां से आए?"

"मैं तुम्हारा पिता हूं। तुम्हें देखने के लिए आया हूंअब तुम्हें दूसरों की मजदूरी करते हुए कष्ट-पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें अपना एक-एक पर दिया करूंगा। उसे बेच-बेचकर सुख-पूर्वक जीवन व्यतीत करना।"

इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार बीच-बीच में आकर एक-एक पर देता। ब्राह्मणियां धनी और सुखी हो गई।

एक दिन उस ब्राह्मणी ने लड़कियों को बुलाकर सलाह की, "अम्मा! जानवरों के दिल का पता नहीं। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए। इसलिए इस बार उसके आने पर हम उसके सभी पर उखाड़ लेंगे।"

उन्होंने अस्वीकार कर दिया। बोली, "ऐसा करने से हमारे पिता को कष्ट होगा"

ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-हंस के आने पर कहा, "स्वामी! आइए।"

जब उसने देखा कि वह उसके पास आ गया है तो दोनों हाथों से पकड़कर उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती लिए जाने के कारण व बगुले के पंख के सदृश हो गए।

अब बोधिसत्व पंख पसारकर उड़ न सके। ब्राह्मणी ने उन्हें मटके में रखकर पाला। उनके जो नए पर निकले, श्वेत ही निकले। पंख निकलने पर वह उड़कर वापस अपने स्थान पर चले आए। फिर वहां नहीं गए।

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