Baal Jagat

गुरु भक्त आरुणि

प्राचीनकाल में एक महान ऋषि हुए हैं, उनका नाम था आयोद धौम्य । महर्षि आयोद धौम्य एक शान्त स्थान में आश्रम बनाकर रहते थे। उनके आश्रम में अनेक शिष्य रहते थे, जो वहां रहकर विद्याध्ययन किया करते थे।

एक बार की बात हैबरसात के दिन थेआकाश में बादल छाए हुए थे। ऋषिवर धौम्य अपने आश्रम में बैठे अपने शिष्यों को विद्यादान कर रहे थेसहसा बादल घने हो गए। आकाश में बिजली चमकने लगी और कानों को फाड़ देने वाली गड़गड़ाहट से दसों दिशाएं कांप उठीं। इसके साथ ही बूंदा-बांदी भी आरम्भ हो गई। देखते ही देखते मसलाधार पानी बरसने लगाऐसा लगने लगा जैसे आज आकाश फटकर ही रहेगा। कछ ही देर में चारों तरफ पानी ही पानी नजर आने लगा। यह देखकर महर्षि आयोद धौम्य को चिन्ता होने लगी कि अब खेतों में बोर्ड हई फसल का क्या होगा? वे चिन्तातर स्वर में अपने शिष्यों से बोले, “ऐसा पानी तो कभी भी नहीं बरसा। लगता है जैसे प्रलय का नजारा उपस्थित होने वाला है। ऐसे में यदि खेत का बांध पक्का नहीं किया गया तो खेत में उपजी सारी फसल नष्ट हो जाएगी।"

“मेरी कुटी रिसती है। जाकर देखू, उसमें पानी न भर जाए।” एक शिष्य महर्षि का मन्तव्य समझकर तत्काल बोल उठा और फिर बिना महर्षि के उत्तर की प्रतीक्षा किए तुरन्त उठकर अपनी कुटी की ओर दौड़ गया।

“मेरी कुटी का पिछला हिस्सा ट्टा हुआ है।" दूसरा शिष्य बोला, "न जाने उसकी क्या दशा होगीमुझे तुरन्त वहां पहुंचना चाहिए।" यह कहकर दूसरा शिष्य भी वहां से चलता बना।

"मेरी वल्कल-वसन तो बाहर ही पड़े हैंकहीं वे बह न जाएं।"

तीसरा शिष्य बोला और जल्दी से उठकर वह भी अपनी कुटिया की ओर दौड़ गया।

इस प्रकार कोई न कोई बहाना बनाकर लगभग सभी शिष्य महर्षि के पास से खिसक गए।

महर्षि का एक शिष्य था आरुणि । उसे अपने सहपाठियों का ऐसा व्यवहार देखकर बहुत दुख हुआवह उठकर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर महर्षि से बोला, "गुरुदेव! आप मुझे आज्ञा दीजिए मैं जाता हूं बांध पक्का करने के लिए।"

गुरुजी ने कहा, “जाओ वत्स! तुम्हीं जाओ, परन्तु इतना याद रखना कि बांध कच्चा न रहने पाए, परिश्रम भले ही अधिक करना पड़े।"

“ऐसा ही होगा गुरुदेव!” कहकर आरुणि खेत की ओर दौड़ गयावह वहां पहुंचा तो क्या देखता है कि बांध एक ओर से टूट गया है और उसके रास्ते पानी बड़े प्रबल वेग से खेत में घुसा चला जा रहा है। यह देखकर आरुणि पूरी शक्ति लगाकर बांध को मिट्टी से भरने की कोशिश करने लगा, लेकिन पानी का प्रवाह इतना तेज था कि उसे रोकने के लिए आरुणि जितनी भी मिट्टी मेंड़ पर डालता, तत्काल वर्षा का जल उसे अपने साथ बहा ले जाता ।

फिर तो मानो उसके और पानी के बीच जैसे युद्ध-सा छिड़ गया । पानी कहता था कि आज छोड़कर कल नहीं बरतूंगा और आरुणि संकल्प किए हुआ था कि बांध कल नहीं, आज ही पक्का करूंगा, परन्तु इस प्रयास में आरुणि की एक भी चाल कामयाब नहीं हो रही थी । वह जब तक मिट्टी का एक लौंदा मेंड़ पर रखता और दूसरा बनाने लगता, तब तक पानी का बहाव उस लौंदे को बहा ले जाता था।

फिर तो मानो उसके और पानी के बीच जैसे युद्ध-सा छिड़ गया । पानी कहता था कि आज छोड़कर कल नहीं बरतूंगा और आरुणि संकल्प किए हुआ था कि बांध कल नहीं, आज ही पक्का करूंगा, परन्तु इस प्रयास में आरुणि की एक भी चाल कामयाब नहीं हो रही थी । वह जब तक मिट्टी का एक लौंदा मेंड़ पर रखता और दूसरा बनाने लगता, तब तक पानी का बहाव उस लौंदे को बहा ले जाता था।

अब आरुणि क्या करे? कैसे गुरु की आज्ञा का पालन करे? कैसे बांध पक्का बने? कैसे खेत का पानी रुके? क्या वह पानी से हार मन ले और खेत का पानी बह जाने दे? परन्तु आरुणि हार मानने वाला नहीं था, वह जीत में विश्वास रखने वाला बालक था। जब उसे और कुछ न सूझा, तब उसने वर्षा पर विजय पाने के लिए एक बिल्कुल नया अनोखा उपाय खोज निकाला वह स्वयं टूटे हुए बांध के स्थान पर जा लेटा । अभिप्राय यह कि उसने मिट्टी के बांध के स्थान पर हाड़-मांस का बांध बना डाला और हाड़-मांस के उसी जीवित बांध के सामने वर्षा को हार माननी पड़ी, खेत के बहते हुए पानी को रुकना पड़ा।

दूसरे दिन जब गुरुजी शिष्यों को पढ़ाने बैठे तो उनमें आरुणि को उपस्थित न देखकर चिन्तित हो गए। उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, “आज आरुणि दिखाई नहीं दे रहा। कहां गया वह?"

“कल सन्ध्या-समय वह मुझे खेत की ओर जाता दिखाई दिया था, गुरुदेव!" एक शिष्य ने बताया “अपनी कुटी में पड़ा होगा।” दूसरा शिष्य बोला, “पढ़ने-लिखने में उसका जी लगता ही कहां है। इतना दिन चढ़ आया और वह अभी भी सोया पड़ा है।"

“कुटी तो उसकी सूनी पड़ी हैकामचोर तो वह है ही, मैं समझता हूं, कल वह अवसर पाकर कहीं भाग निकला है।” तीसरे शिष्य ने कहा।

परन्तु गुरुजी कुछ न बोले, वे चुपचाप खेत की ओर चल पड़े और वहां पहुंचकर करुण-स्वर में आरुणि को पुकारने लगे, “आरुणि....आरुणि. ...! बेटा कहां हो तुम? मुझे उत्तर दो।"

जब कहीं से कोई उत्तर न मिला, तब गुरुजी व्याकुल होकर खेत में चक्कर काटने लगेअन्त में वे ठीक स्थान पर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि बेसुध आरुणि ने टूटे हुए बांध को घेर रखा है, उसके शीत से अकड़े हुए शरीर पर गीली मिट्टी की परतें जम गई हैं और वह धीमे-धीमे सांस ले रहा है।

असल बात समझने में गुरुजी को विलम्ब न लगा । उनकी आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगेवे आरुणि को तत्काल उठाकर आश्रम में ले गए। उन्होंने अपने हाथों में आरुणि का शरीर धोया-पोंछा और उस पर तेल की मालिश की फिर उसे गर्म कपड़ों से ढककर लिटा दिया । थोड़ी ही देर बाद आरुणि को होश आ गयाअब तो गुरुजी बहुत प्रसन्न हुए और उसके सिर पर प्रेम भरा हाथ फेरते हुए बोले, “बेटा आरुणि! मुझे तुम्हारी गुरु-भक्ति पर गर्व है मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम्हें सारी विद्याएं स्वतः ही प्राप्त हो जाएं, तुम सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करो और खूब नाम कमाओ ।"

गुरुजी का आशीर्वाद सचमुच खूब फला-फूलाआगे चलकर यही आरुणि प्रसिद्ध ब्रह्मवेत्ता उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसने अपने गुरु एवं स्वयं का नाम खूब रोशन किया

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