Baal Jagat

कंजूस सेठ

पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त राज्य करता था। उस समय वाराणसी में इल्लीस नाम का एक सेठ था। उसके पास अस्सी करोड़ धन था। लेकिन वह पुरुष के दुर्गुणों से युक्त, लंगड़ा, लूला, बैंहगा, अश्रद्धावान्, अप्रसन्नचित्त तथा कंजूस था। न किसी को देता, न अपने-आप ही खाता था। उसका घर ऐसा ही था जैसे राक्षस-गृहीत पुष्करणी। हां, उसके माता-पिता सात पीढ़ी तक दानशील रहे। इसने कुल-मर्यादा का नाश करके दानशाला जला दी। याचकों को पीटकर बाहर निकाल दिया। केवल धन ही संग्रह करता था।

एक दिन वह राजा की सेवा में गया। लौटते समय उसने रास्ते में थके हुए नागरिक को देखा। वह शराब की सुराही ले, पीढ़े पर बैठकर, हुई मछली खा, खट्टी शराब के कसोरे भर-भरकर पी रहा था। देखकर उसके मन में शराब पीने की इच्छा हुई। लेकिन वह सोचने लगा, “यदि सुरा पीऊंगा तो मेरे पीने पर और बहुत लोग पीने की इच्छा करेंगे। मेरा खर्च होगा।"

उसने तृष्णा को मन में दबा लिया। लेकिन इस तीव्र इच्छा को न सह सकने के कारण उसका शरीर धुनी हुई रुई की तरह सफेद हो गया। गात धमनी को जा लगा।

एक दिन वह चारपाई पर सिमटकर पड़ रहा। उसकी भार्या ने आकर पीठ मलते हुए पूछा, "स्वामी! क्या रोग है?"

"मुझे कोई रोग नहीं।"
"क्या राजा क्रुद्ध हो गया?"
"राजा मुझसे क्रुद्ध नहीं हुआ है?"
"तो क्या तुम्हारे बेटा-बेटी, नौकर-चाकरों से कुछ अपराध हो गया है?"
"ऐसा भी कुछ नहीं।"
"तो क्या किसी चीज में तृष्णा हो गई है?"
श्रेष्ठी चुप रहा। तब भार्या ने पूछा, “स्वामी! तुम्हारी तृष्णा किस चीज में है?"
"उसने शब्दों को निगलते हुए की तरह कहा, "मेरी एक तृष्णा है।"
"स्वामी! क्या तृष्णा है?"
"शराब पीने की इच्छा है।"
"तो कहते क्यों नहीं? क्या तुम दरिद्र हो? अब इतनी शराब बनवा दूंगी कि सारे निगमवासियों के लिए पर्याप्त होगी।"
"तझे उनसे क्या? वह अपने कमाकर पीएंगे।"
"अच्छा तो उतनी ही तैयार कराऊंगी कि एक गली के लोगों के लिए पर्याप्त होगी।"
"जातना हूं, तू बड़ी धनवान है।"
"अच्छा तो उतनी ही बनवाऊंगी जो इस घरवालों के लिए पर्याप्त होगी।"
"जानता हूं, तू बड़ी उदार है।"
"अच्छा तो उतनी ही तैयार कराऊंगी जो तुम्हारे स्त्री-बच्चों के लिए पर्याप्त हो।"
"तुझे इनसे क्या?"
"अच्छा तो उतनी ही तैयार कराऊंगी जो तुम्हारे और मेरे लिए पर्याप्त हो।"
"क्यों, क्या अपने घर से बहुत धन लेकर आई है?"
"अच्छा तो उतनी ही बनवाऊंगी जो तुम्हारे लिए पर्याप्त हो।"
सेठ ने सोचा, "घर में शराब बनवाने पर बहुत लोग आशा लगाएंगेदुकान से मंगाकर भी यहां बैठकर नहीं पी सकता।" उसने एक मासक (कार्षापण का बीसवां हिस्सा) देकर दुकान से शराब की सुराही मंगवाई। नौकर से उठवाकर नगर से बाहर नदी के किनारे गया। एक घनी जगह में घुसकर सुराही को रखवाया। नौकर से कहा, "तू जा।" नौकर को दूर बिठाकर कसोरे भर-भरकर पीने लगा।

दानादि करने से उसका पिता देवलोक में 'शक्र' होकर उत्पन्न हुआ थाउसने ध्यान लगाकार देखा कि उसका चलाया हुआ दान अभी भी दिया जा रहा है या नहीं? उसने उसका चालू न रहना, पुत्र का कुल-मर्यादा का नाश कर दान-शाला को जला देना, याचकों को पीटकर निकाल देना तथा कंजूस बनकर औरों को देने के भय से एकान्त में छिपकर शराब पीना देखा। उसने सोचा, “मैं जाकर उसको क्षुब्ध करके उसका भन करूंगा। उसे कर्म-फल का ज्ञान कराकर, उसके हाथ से दान दिलवाकर उसे देव-लोक में उत्पन्न होने योग्य बनाऊंगा।"

शक्र मनुष्य-रूप धारण कर ठीक इल्लीस जैसी लूली-लंगड़ी शक्ल बनाकर राजगृह नगर में प्रविष्ट हुआ। राजा के पास जाकर राजा को प्रणाम कर एक ओर खड़ा हुआराजा ने पूछा, “सेठजी! कहो, असमय कैसे आए?"
"देव! मेरे घर में अस्सी करोड़ धन है। मैं चाहता हूं कि आप उसे मंगवाकर अपने खजाने में भरवा लें।"
" सेठजी! हमारे घर में तुम्हारे धन से कहीं अधिक धन है।"
"देव! यदि आपको आवश्यकता नहीं है तो मैं उसे लेकर यथेच्छ दान देता हूं।"
"सेठजी! दें।"
"अच्छा देव!"-कहकर राजा को प्रणाम कर शक्र इल्लीस सेठ के घर गया। सब नौकर-चाकर घेरकर खड़े हो गए। कोई भी यह न जान सका कि यह इल्लीस नहीं है। उसने घर में प्रवेश कर देहली पर खड़े हो द्वारपाल को आज्ञा दी. "यदि कोई ठीक मेरे जैसी शक्ल वाला आए और 'यह मेरा घर है' कहकर प्रवेश करे तो उसकी पीठ पर प्रहार करके उसे बाहर निकाल देना।" प्रासाद् के ऊपर चढ़कर अत्यन्त मूल्यवान आसन पर बैठकर श्रेष्ठी-भार्या से मुस्कराकर कहा, “भद्रे! दान दें।" यह सुनकर सेठानी, लड़के-लड़कियों तथा नौकर-चाकर कहने लगे, "इतने समय तक कभी दान देने का विचार तक नहीं आया। आज शराब पीने के कारण मृदु-चित्त हो दान देने की इच्छा उत्पन्न हो गई होगी!" सो सेठानी ने कहा, "स्वामी! यथारुचि दें।" सारे नगर में मुनादी करवादी गई कि जिसको चांदी, सोना, मणि-मोती की आवश्यकता हो वह इल्लीस सेठ के घर जावे। लोग झोली, थैला लेकर द्वार पर इकट्ठे हो गए। शक्र ने सात रत्नों से भरे कमरों को खोलकर कहा, "यह सब तुम्हें देता हूं। जितनी-जितनी जरूरत हो, ले जाओ।" लोग धन को भर-भरकर ले जाने लगे।

एक देहाती इल्लीस सेठ के ही रथ में, इल्लीस सेठ के बैल जोत कर सात रत्नों से भरकर नगर से बाहर जा रहा था। उसे घने स्थान से कुछ दूर पर रथ को हांकता हुआ वह सेठ की प्रशंसा करता जाता था, "स्वामी इल्लीस! तेरी सौ वर्ष की आयु हो। तेरे कारण अब मैं जन्मभर बिना काम किए भी जी सकता है। तेरा ही रथ. तेरे ही बैल. तेरे ही घर के सात प्रकार के रत्न! न मां ने दिए, न बाप ने दिए, स्वामी! तेरे ही कारण मिले।"

इल्लीस ने यह शब्द सुनकर भयभीत हो सोचा, "यह मेरा नाम लेकर क्या कहता है! क्या राजा ने मेरा धन लोगों को बांट दिया है?" वह तुरन्त उठा और जाकर बैलों की नकेल पकड़ ली, “अरे चेटक! यह मेरा ही रथ और बैल कहां लिए जा रहा है?" गृहपति ने रथ से उतरकर कहा, "अरे दुष्ट चेटक! इल्लीस सेठ सारे महानगर को दान दे रहा है, तेरा क्या लगता है?" उसने सेठ को झटककर बिजली की तरह गिरा दिया। कन्धे पर प्रहार करके रथ ले चला गया।

सेठ ने कांपते हुए उठकर धूल झाड़ी। तेजी से दौड़कर दुबारा फिर रथ को घेरा। गृहपति ने उतरकर उसके बाल पकड़कर बांस की चपटी से मारा। गला पकड़कर जिधर से आया था, उधर मुंह करके धक्का दिया और रथ लेकर चला गया।

इतने में उसका शराब का नशा उतर गया।

उसने कांपते-कांपते घर जाकर मनुष्यों को धन ले जाते देखा। " भो! यह क्या? क्या राजा मेरा धन लुटवा रहा है?" कहकर जिस किसी को भी पकड़ना शुरू किया। जिसे पकड़ता, वही उसे पीटकर पैरों में गिरा देता। वेदना से पीड़ित हो उसने घर में घुसना चाहा। द्वारपालों ने पीटकर गर्दन पकड़कर निकाल दिया।

उसने सोचा, “अब राजा के सिवा मुझे किसी की शरण नहीं।"
इसलिए राजा के पास जाकर कहा, "देव! आप मेरा धन लुटवा रहे हैं?"
“सेठजी! क्या तुमने ही अभी आकर नहीं कहा था कि देव! यदि आप नहीं लेते तो मैं अपने धन को दान दूंगा?"
"देव! मैं आपके पास नहीं आया। क्या आप मेरे कंजूस होने की बात नहीं जानते? मैं किसी को तिनके के कोने से तेल की एक बूंद तक नहीं देता। देव! जो यह दान दे रहा है, उसे बुलाकर परीक्षा करें।"

राजा ने शक्र को बुलावा भेजान तो राजा को ही उन दोनों जनों में कुछ भेद दिखाई दिया, न मन्त्रियों को ही। कंजूस सेठ ने पूछा, “देव! सेठ यह है कि मैं हूं?"

"हम नहीं पहचानते। तुझे कोई पहचानने वाला है?"

"देव मेरी भार्या!"

भार्या को बुलाकर पूछा गया, "तेरा स्वामी कौन है?" वह शक्र ही के पास जाकर खड़ी हो गई। लड़के-लड़कियों, नौकर-चाकरों को बुलाकर पूछा। सब शक्र के ही पास जाकर खड़े हो गए

तब सेठ ने सोचा, "मेरे सिर में बालों से छिपी एक फुन्सी है। उसे केवल नाई ही जानता है, सो उसे बुलवाऊँ।" उसने कहा, "देव! मुझे नाई पहचानता है। उसे बुलवावें।" राजा ने बुलवाकर पूछा, “इल्लीस सेठ को पहचानते हो?"

"देव! सिर को देखकर पहचान सकूँगा।" शक्र ने उसी क्षण सिर में फुन्सी पैदा कर ली। नाई ने दोनों के सिर में फुन्सी देखकर कहा, "महाराज दोनों के सिर में फुन्सी है। मैं इन दोनों में से किसी को नहीं कह सकता कि यह इल्लीस सेठ है।"

नाई की बात सुनकर सेठ कांपने लगा। उस समय शक्र से अपने को सम्भाल न सकने के कारण वहीं गिर पड़ा। उस समय शक्र शक्र-लीला से आकाश में जाकर खड़ा हुआ उसने कहा, “महाराज! मैं इल्लीस नहीं, शक्र हूँ।

इल्लीस का मुंह पोंछकर पानी छिड़का गया। वह उठकर देवेन्द्र शक्र को प्रणाम कर खड़ा हुआ। तब शक्र ने कहा, "इल्लीस! यह धन मेरा है, न कि तेरा। मैं तेरा पिता हूं, ते मेरा पुत्र। मैंने दानादि पुण्य-कर्म करके शक्र की पदवीं ग्रहण की। लेकिन तूने मेरे वंश की मर्यादा को तोड़ दिया। कंजूस होकर दानशाला को जला दिया, याचकों को बाहर निकाल दिया। खाली धन-संग्रह करता है। न तू आप खाता है, न दूसरे को देता है। धन ऐसे पड़ा है, जैसे राक्षस के अधिकार में हो। यदि जैसे पहले था, वैसे ही दानशाला बनवाकर दान देगा तो तेरी कुशल है, नहीं तो तेरे सब धन को अन्तर्धान कर इन्द्र-व्रज से तेरा सिर फोड़कर जान निकाल दूंगा।"

इल्लीस सेठ ने मरने के भय से संत्रिसित होकर प्रतिज्ञा की कि वह दान देगा। उसकी प्रतिज्ञा ग्रहण कर शक्र अपने स्थान को चला गया।

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