Baal Jagat | बाल - जगत

मणिकण्ठ

पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त नामक राजा राज्य करता था। उस समय बोधिसत्व महाधनवान कुल में पैदा हुए। जब बालक इधर-उधर दौड़ने योग्य हो गया तब दूसरा भी पुण्यवान प्राणी उसकी माता की कोख में आयाबच्चों के बड़े होने पर माता-पिता का निधन हो गया। इससे उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ और वे ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हुए। दोनों भाई गंगातट पर पर्णशाला बनाकर रहने लगे। ज्येष्ठ भाई की पर्णशाला गंगा के ऊपर की तरफ रहते थे जबकि छोटा भाई नीचे की तरफ।

एक दिन मणिकण्ठ नाम का नागराजा अपने भवन से निकलकर गंगा के किनारे ब्रह्मचारी के रूप में घूमता हुआ छोटे भाई के आश्रम पर पहुंचा। प्रणाम करके एक ओर बैठा। परस्पर कुशल-क्षेम पूछकर वे दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे के विश्वासी हो गए। अकेले न रह सकते थे। मणिकण्ठ नित्य तपस्वी के पास आता। बैठकर बातचीत करता। तपस्वी के प्रति स्नेह होने के कारण घर जाते समय अपना रूप छोड़कर फन से तपस्वी को घेरते हुए लिपट जाता। उसके सिर पर बड़ा-सा फन निकालकर थोड़ी देर विश्राम करता, फिर स्नेह त्याग, शरीर को लपेटकर तपस्वी को प्रणाम करता और अपने भवन को चला जाता। तपस्वी उसके भय से कृश हो गया। सूख गया। दुर्वर्ण हो गया। पाण्डुवर्ण हो गया। धमनियां गात्र से जा लगी।

वह एक दिन भाई के पास गयाउसने इससे पूछा, “ क्या कारण तू कृश हो गया है? सूख गया है। दुर्वर्ण हो गया है? पाण्डुवर्ण हो गया धमनियां गात्र से जा लगी हैं?" उसने भाई से वह हाल कहा। भाई ने "तू उस नाग का आना पसन्द करता है या नहीं?"

"नहीं।"

"जब वह नागराजा तेरे पास आता है तो क्या गहने पहनकर आता है?"

"मणि-रत्न।"

"तो अगली बार जब नागराजा तेरे पास आए तो उसके बैठने से पहले ही मांगना, "मझे मणि दे।" वह नाग तझे बिना फन से लपेटे ही चला जायगा। दूसरे दिन आश्रम के द्वार पर आते ही मांगना। तीसरे दिन गंगा के किनारे खड़े होकर उसके पानी से निकलते ही मांगना। इस प्रकार वह फिर तेरे पास नहीं आएगा।"

तपस्वी ने 'अच्छा' कहा और अपनी पर्णकुटी में चला गया। दूसरे दिन नागराजा के आकर खड़े होते ही याचना की, "यह अपने पहनने की मणि मुझे दे।" वह बिना बैठे ही चला गया। दूसरे दिन उसने आश्रम-द्वार पर खड़े होकर उसके आते ही मांगा,"कल मुझे मणिरत्न नहीं दिया, आज तो मिलना ही चाहिए।" नाग बिना आश्रम में घुसे ही चला गया। तीसरे दिन उसके पानी से निकलते ही कहा, "आज मुझे मांगते-मांगते तीसरा दिन हो गया। आज मुझे यह मणिरत्न दे।" नागराजा ने पानी में खड़े-ही-खड़े कहा-

"इस मणि के कारण मुझे बहुत अन्न-पान की प्राप्ति होती है। तू अति याचक है। जैसे कोई तरुण पत्थर पर तेज की हुई तलवार लेकर किसी को डराए. उसी तरह तु मुझे यह मणि मांगकर त्रास देता है। मैं यह तुझे न दूंगा और मैं तेरे आश्रम में भी नहीं आऊंगा।"

इतना कहकर वह नागराजा पानी में डुबकी मार अपने नाग-भवन चला गया। फिर वापस नहीं आया।

ज्येष्ठ तपस्वी छोटे भाई का हाल-चाल जानने के लिए उसके पास आयाउसने यह सारा वृत्तान्त सुन और छोटे तपस्वी को स्वस्थ, प्रसन्न देखकर कहा-

"जो चीज मालूम हो कि किसी की प्रिय है, वह उससे न मांगे। अति याचना करने वाले के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है। सात रत्नों से परिपूर्ण नाग-भवन में रहने वाले नागों को भी याचना अप्रिय होती है।"

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