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परशुराम की कथा | श्रीमद्भागवत पुराण से

राजा पुरुरवा ने उर्वशी अप्सरा से जो वंशवृद्धि की, उसी वंश में गाधि नाम का एक राजा हुआ। उसकी कन्या सत्यवती थी । ऋचीक मुनि ने गाधि की पुत्री से विवाह करने की इच्छा की गाधि ने ऋचीक को अयोग्य है' कहकर पुत्री से विवाह की अनुमति नहीं दी गाधि ने कहा, “यदि तुम एक सहस्त्र श्वेत अश्व जिनके कर्ण श्याम हों, शुल्क रूप में देने को तैयार हो तो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुमसे कर सकता हूं।" ऋषि वरुण देवता के पास गए और उन्हें अपना अभिप्राय सुनाया वरुण देवता ने ऋषि को एक सहस्र श्याम कर्ण घोड़े दे दिएऋषि ने राजा गाधि को श्याम कर्ण अश्व लाकर दे दिए और उसकी कन्या सत्यवती को ब्याह कर घर ले आए

एक दिन सत्यवती ने ऋचीक मुनि से पुत्र की कामना की सत्यवती की माता ने भी पत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की। ऋचीक ने दोनों के लिए अलग-अलग चरु तैयार किए और स्नान के लिए चले गए। पीछ से सत्यवती की माता ने सोचा कि ऋषि ने सत्यवती के लिए उत्तम चरु तैयार किया होगाउसने सत्यवती के लिए रखे चरु को स्वयं खा लिया और सत्यवती को अपना चरु खिला दिया। ऋषि को जब यह पता चला तो उन्होंने सत्यवती से कहा, “यह बड़ा अनर्थ हो गयाअब तुम्हारा पुत्र तो ब्राह्मण विरोधी एवं क्रूरकर्मी होगा और तुम्हारी माता का पुत्र ब्राह्मण स्वभाव का होगा।"

सत्यवती घबरा गईउसने पति से विनती की, तब ऋषि ने कहा, "तुम्हारा पुत्र नहीं तो पौत्र अवश्य ही क्रूरकर्मी होगा।"

सत्यवती के यहां जमदग्नि ने जन्म लिया इनका विवाह ऋषि कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका के गर्भ से ही सबसे छोटे पुत्र परशुराम जी का जन्म हुआ थाउन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन कर दिया था

एक बार हैहयवंशी राजा सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलते-खेलते जमदग्नि के आश्रम पर पहुंच गया। मुनि जमदग्नि ने उसका आदर-सत्कार किया। जमदग्नि के यहां कामधेनु गाय थीउसी के गोरस के भण्डार से जमदग्नि वैभवशाली तरीके से सबका सत्कार करते थे। सहस्रबाहु बिना पूछे ही कामधेनु को खोलकर बलपूर्वक अपने नगर में ले गया । परशुराम ने आश्रम में लौट आने पर सहस्रबाहु की विशाल सेना का संहार किया और उसका सिर अपने फरसे से काट डाला जमदग्नि ऋषि ने जब यह सुना तो उन्हें बहुत खेद हुआ। उन्होंने परशुराम को तीर्थयात्रा करके प्रायश्चित से अपने पापों को धो डालने हेतु भेज दिया

एक वर्ष तक सभी तीर्थों में स्नान करते हुए परशुराम भ्रमण करते रहे और अन्त में अपने आश्रम पर वापस आए एक दिन परशुराम की माता रेणुका जल लेने गईं वहां उन्हें चित्ररथ के प्रति अनुराग हो गया । वे जल लेकर अनमनी स्थिति में आश्रम लौटीं। पत्नी को इतने विलम्ब से लौटती देख जमदग्नि को क्रोध आ गया। उन्होंने अपने मनोबल से पत्नी की मानसिक स्थिति का अवलोकन कियाक्षुब्ध होकर उन्होंने परशुराम से अपनी माता का वध करने के लिए कहा। पितृभक्त परशुराम ने पिता के प्रभाव को जानते हुए माता को मार डाला । पुत्र के इस कर्म से प्रसन्न होकर जमदग्नि ऋषि ने कहा, “तुम जो मांगोगे, मैं वहीं दूंगा।"

परशुराम ने प्रणाम करके कहा, “मेरी माता को पुनः जीवित कर दीजिए और ऐसा वर दीजिए कि उन्हें यह भी याद न रहे कि मैंने यह नीच कृत्य किया है।" ऋषि ने परशुराम की इच्छा पूरी की

एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्रों ने अवसर पाकर समाधि में बैठे जमदग्नि ऋषि को मार डाला और उनका सिर काटकर अपने नगर में ले गएरेणुका चिल्लाई, “हे राम! हे परशुराम!" और छाती पीट-पीटकर रोने लगीं। रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीट-पीटकर परशुराम को पुकारा था परशुराम ने प्रतिज्ञा की कि वे इक्कीस बार पृथ्वी से क्षत्रिय वंश का नाश करेंगे । वहां से वे सहस्त्रबाहु के नगर में गएउसके सभी पुत्रों को मार डाला और पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी की । अपने पिता का सिर लाकर उन्होंने धड़ से जोड़ दिया तथा यज्ञ भगवान की पूजा कीपरशुराम के प्रभाव से जमदग्नि ऋषि जीवित हो गए और 'सप्तर्षि-मण्डल' में सातवें ऋषि गिने गए।

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