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शकुन्तला-दुष्यन्त की कथा

पुरुवंश में अनेक राजर्षि हुए हैं। राजा दुष्यन्त भी इन्हीं के वंशज थे । एक बार राजा दुष्यन्त शिकार खेलने निकले तो कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंच गएवहां उन्होंने एक बहुत ही सुन्दर कन्या को देखा । राजा दुष्यन्त उस सुन्दरी को देखकर उस पर अत्यन्त मोहित हो गएउस समय आश्रम में वह कन्या अकेली ही थी । युवती ने राजा से कहा, "मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूं। वे इस समय तपस्या में समाधिस्थ हैं। आप मेरा आतिथ्य स्वीकार करें।"

राजा ने कहा, "देवी! मैं क्षत्रिय हूं। मैं आपको देखकर मोहित हो गया हूंआप निश्चय ही ब्राह्मण-पुत्री नहीं हो सकतीं।"

युवती ने कहा, “सच है। मैं ऋषि विश्वामित्र एवं मेनका की पुत्री शकुन्तला हूं । जन्म होते ही मेरी माता मुझे यहां छोड़कर चली गई । कण्व ऋषि ने ही मेरा पालन-पोषण किया, इसलिए मैं उनकी पुत्री हूं।"

शकुन्तला की बातों से राजा और भी अधिक प्रभावित हुएशकुन्तला की स्वीकृति प्राप्त कर राजा दुष्यन्त ने उससे ‘गन्धर्व-विवाह' किया कुछ समय अपनी प्रिय पत्नी के साथ बिताने के बाद राजा अपनी नगरी को लौट गए।

शकुन्तला गर्भवती थी । समय आने पर उसे पुत्र हुआ महर्षि कण्व ने उसका विधिवत जातकर्म संस्कार आदि किया और उसको क्षत्रिय धर्म के अनुरूप शस्त्रविद्या की शिक्षा देने लगे । वह बालक बचपन से ही साहसी एवं बलवान था। सिंह शावकों को बांधकर उनके साथ खोलना उसकी एक विशेषता ही थी। राजा दुष्यन्त ने लौटते समय शकुन्तला को कण्व ऋषि के आने के बाद अपनी नगरी में ले जाने का वचन दिया था । शकुन्तला उनके पास गई, पर राजा ने शापवश उसे स्वीकार नहीं किया ।

राजा दुष्यन्त को शकुन्तला से विवाह आदि का विस्मरण हो गया अतः शकुन्तला कण्व के आश्रम में रहती रही तथा यहीं उसने अपने पुत्र को जन्म दिया । यही पुत्र आगे चलकर भरत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भरत के नाम से आज हमारा देश 'भारतवर्ष' कहा जाता है । बालक भरत की ही सिंह-शावकों को बांधकर खोलने की लीला, शिकार खेलने आए राजा दुष्यन्त ने देखी। राजा को स्वाभाविक स्नेह उत्पन्न हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई, जिसने राजा को स्मरण कराया कि शकुन्तला से गन्धर्व विवाह करके तुमने ही बालक को उत्पन्न किया है तब राजा दुष्यन्त ने कण्व ऋषि से क्षमा-प्रार्थना की तथा अपनी पत्नी शकुन्तला एवं पुत्र भरत को लेकर अपनी राजधानी लौट गए।

राजा दुष्यन्त के बाद भरत चक्रवर्ती सम्राट बने उन्होंने गंगासागर से गंगोत्री तक पचपन अश्वमेध यज्ञ और प्रयाग से लेकर यमुनोत्री तक यमुना तट पर अठहत्तर अश्वमेध यज्ञ किए राजा भरत ने सर्वाधिक यज्ञ करके सभी राजाओं में श्रेष्ठता प्राप्त कीउन्होंने पृथ्वी पर एकछत्र राज्य किया ।

राजा भरत के तीन पुत्र हुए। उन्होंने उन तीनों को अयोग्य समझा और उत्तम सन्तान हेतु 'मरुतसोम' यज्ञ किया । यज्ञ से मरुद्गण प्रसन्न हुएउन्होंने भरद्वाज नाम का पुत्र भरत को दे दिया।

बृहस्पति ने अपने भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी से सहवास करना चाहा । तब गर्भस्थ शिशु ने उन्हें रोका बृहस्पति ने उस सन्तान को अन्धे हो जाने का शाप देकर भाई की पत्नी से सहवास किया । गर्भ में पुनः शिशु आ जाने से वह डर गई कि कहीं मेरे पति मेरा त्याग न कर दें, अतः उसने उस पुत्र को त्यागना चाहा । तब बृहस्पति ने कहा, "यह मेरा औरस पुत्र होगा एवं मेरे भाई का क्षेत्रज । माता-पिता के परस्पर विवाद के कारण उस पुत्र का त्याग कर दिया गया । इसीलिए इस पुत्र का नाम भरद्वाज हुआ भरत का वंश नष्ट होने लगा। तब मरुद्गणों ने राजा भरत को दत्तक पुत्र के रूप में भरद्वाज को प्रदान किया ।"

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