Baal Jagat | बाल - जगत | कथा | कहानी

शिव महिमा

बहुत समय पहले की बात है। किसी नगर में एक जुआरी रहा करता वह एक दूषित प्रवृत्ति का व्यक्ति थाघोर नास्तिक और देवता तथा ब्राह्मणों की सदैव निन्दा करता रहता था। परनिन्दा, परस्त्रीगमन एवं अन्य दूसरे अनेक अवगुण उसमें मौजूद थेउसकी मित्रता भी ऐसे ही लोगों थी, जो उसी के समान पापकर्मों में लिप्त रहते थे

एक बार उस व्यक्ति ने कपटपूर्ण ढंग से जुए में ढेर सारा धन जीता उस धन से उसने अनेक स्वर्ण आभूषण खरीदे, पनवाड़ी से पान का एक बीड़ा बनवाया, सुगन्धित पुष्पों की मालाएं खरीदीं और उन्हें लेकर अपनी प्रेयसी, जो एक वेश्या थी, उसके घर की ओर चल पड़ा वह जल्द से जल्द वहां पहुंचना चाहता था अतः तेजी से दौड़ने लगा। अचानक उसका एक पांव एक नीची जगह पर जा पड़ा, जिसके कारण उसका सन्तुलन बिगड़ गया और वह औंधे मुंह भूमि पर जा गिरा मस्तक में गहरी चोट आने के कारण उसकी चेतना जाती रही । उसका सारा सामान भूमि पर बिखर गया

जब उसे होश आया तो उसे पश्चाताप होने लगा कि एक वेश्या से मिलने के लिए वह क्यों इतना अधीर हो रहा था उसके मन में वैराग्य पैदा हो गया उसने भूमि पर बिखरी सामग्री एकत्रित की, मन में बड़े शुद्धभाव लिए वह एक शिव मन्दिर में पहुंचा और सारी सामग्री शिवलिंग को समर्पित कर दी बस, पूरे जीवन में उसने यही एक पुण्य का कार्य किया

समय बीतने पर जब उसकी मृत्यु का समय आया तो यमदूत उसे यमलोक ले गए। वहां उसे चित्रगुप्त के समक्ष पेश किया गया। चित्रगुप्त ने उसके जीवन का लेखा-जोखा पढ़कर उससे कहा, “अरे मानव! तुम्हारा सारा जीवन तो पाप कार्यों में ही बीता हैतूमने तो असंख्य पाप किए हैं, जिनका परिणाम तुझे नर्क में रहकर चिरकाल तक भोगना पड़ेगा।"

तब उस जुआरी व्यक्ति ने कहा, “आपका कहना सत्य है भगवन् ! निश्चय ही मैं बहुत बड़ा पापी हूं और ये भी निश्चित है कि उन पापों की सजा मुझे भुगतनी पड़ेगी, पर मेरे द्वारा किए गए किसी पुण्य कार्य पर भी विचार कर लीजिए । सम्भव है कि मेरे द्वारा कभी कोई पुण्य कार्य भी किया गया हो।"

चित्रगुप्त ने उसके जीवन का लेखा-जोखा एक बार फिर से देखा और बोले, “तुमने मरने से पूर्व एक बार थोड़े-से पुष्प एवं कुछ सुगन्ध भगवान शंकर को अर्पित किए थेइसके फलस्वरूप तुम कुछ देर के लिए स्वर्ग जाने के अधिकारी बन गए हो। तुम्हें तीन घड़ी के लिए स्वर्ग का शासन एवं इन्द्र का सिंहासन प्राप्त होगा अब बताओ तुम पहले अपने पुण्य का फल चाहते हो या अपने पापों का?"

जुआरी बोला, “हे देव! नर्क में तो मुझे लम्बे समय तक रहना हैपहले मुझे स्वर्ग का सुख भोगने के लिए भेज दीजिए।"

तब यमराज की आज्ञा से उस जुआरी व्यक्ति को स्वर्ग में भेज दिया गया । देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र को समझाया, “तुम तीन घड़ी के लिए अपना यह सिंहासन इस जुआरी के लिए छोड़ दोपुनः तीन घड़ी पश्चात् यहां आ जाना ।” इन्द्र ने वैसा ही किया।

इन्द्र के जाते ही वह जुआरी स्वर्ग का राजा बन गया । उसने मन में विचार किया, “बस, अब भगवान शंकर की शरण में जाने के सिवाय अन्य कोई उपाय नहीं, जिससे मेरा उद्धार हो सके ।” अतः उसने उन्मुक्त ढंग से अपने अधिकृत पदार्थों का दान देना शुरू कर दिया उसने इन्द्र का ऐरावत हाथी महर्षि अगस्त्य को दान कर दिया उच्चैश्रवा घोड़ा विश्वमित्र जी को दे डाला। कामधेनु गाय महर्षि वशिष्ठ को दान कर दीचिन्तामणि रत्नमाला महर्षि गालव को भेंट कर दी। कल्पवृक्ष कौडिन्य मुनि को समर्पित कर दियाइस प्रकार जब तक तीन घड़ियां समाप्त हुईं, तब तक वह मुक्तहस्त से दान करता गया और स्वर्ण के सारे बहुमूल्य पदार्थ दान में दे डाले तीन घड़ियां व्यतीत होने पर उसे वापस नर्क में भेज दिया गया।

जब इन्द्र लौटकर आए तो सारी अमरावती ऐश्वर्य-विहीन हो चुकी थी वे बृहस्पति जी को लेकर यमराज के पास पहुंचे और उन पर क्रोधित होते हुए कहने लगे, “धर्मराज! आपने मेरा पद एक जुआरी को देकर बहुत अनुचित कार्य किया है। उसने तो वहां की सारी बहुमूल्य वस्तुएं दान में दे डालीं। मेरे सभी बहुमूल्य रत्न ऋषि-मुनियों को दान कर दिएमेरी अमरावती को तो ऐश्वर्य-विहीन कर दिया है।"

यह सुनकर धर्मराज ने उत्तर दिया, “देवराज इन्द्र! आप बूढ़े हो गए, किन्तु अभी तक आपकी राज्य विषयक आसक्ति दूर नहीं हुई। उस जुआरी का एक पुण्य आपके सौ यज्ञों से भी कहीं अधिक महान है । जो भी व्यक्ति भगवान शिवशंकर पर श्रद्धानत होकर फल-पुष्प आदि चढ़ाता है, उसके अनेक पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं जो लोग प्रमाद में न पड़कर सत्कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, उन्हीं का जीवन धन्य होता हैआपके लिए अब यही उचित रहेगा कि आप उन ऋषियों को धन देकर या उनके चरणों में गिरकर, विनयपूर्वक आग्रह करके उनसे अपनी रत्नों को मांग लेंवे लोग दयालु हैंमुझे विश्वास है वे आपकी चीज अवश्य लौटा देंगे।"

इन्द्र वापस अमरावती लौट गए और उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से प्रार्थना कर फिर से वे वस्तुएं प्राप्त की उस जुआरी व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तन हुआ अपने पापों का पश्चाताप करते हुए वह निरन्तर भगवान शंकर की आराधना में लगा रहा अन्ततः उसके पापों का शमन हआ और भगवान शंकर की कृपा से कालान्तर में उसे फिर से राजसुख भोगने का अवसर मिला । उस जुआरी व्यक्ति ने अगले जन्म में दानव कुल में जन्म लिया ।

दानव कुल में जन्मा वह पूर्व जन्म का पापी जुआरी कोई और नहीं, महादानी विरोचन का पुत्र बलि था, जो अपने पिता से भी बढ़कर दानी साबित हुआभगवान विष्णु ने जब 'वामन' के रूप में उससे तीन पग धरती दान में मांगी तो उसने अपना सर्वस्व दान कर दिया थायहां तक कि जब 'वामन' ने दो पगों में समूचे आकाश और पाताल को नाप लिया तो तीसरे पग के लिए उसने अपना शीश ही प्रस्तुत कर दिया था।

Immune tone Capsules
Samridhi Organi
Freia | Viviano Healthcare Pvt. Ltd.

बाल जगत