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COVID19

How to save elders | कोरोनासे बुजुर्गों को बचाएं

विश्व को कोरोना संक्रमण ने अपनी गिरफ्त में ले रखा हैसंक्रमण से बचाव के लिए कड़े से कड़े उपाय अपनाए गए। विभिन्न देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं, हवाई यात्राएं रोक दी गयीं। यहाँ तक कि देश के अन्दर भी आवागमन प्रतिबंधित हो गया हर तरह का कार्य कलाप एक लम्बी अवधि के लिए रोक दिया गया ताकि एक दूसरे से संक्रमण न फैले। अब जब चीजों को धीरे धीरे सामान्य करने की कोशिश की जा रही है, विभिन्न व्यवसायों को क्रमिक रूप से खोला जा रहा है तो भी संक्रमण से बचने की एहतियात बरती जा रही है।कोरोना संक्रमण से बचने के लिए बार बार हाथ धोना, मास्क पहनना, हर प्रकार की सतह को सैनिटाइज करना तो नियम से बन चुके हैं और सबसे जरूरी हर व्यक्ति से दूरी (सोशल डिस्टेंस) बना कर रखना होगा। यह संक्रमण इतने विकराल रूप में फैला है कि अति शीघ्र नियंत्रण करना मुश्किल लगता है। विभिन्न देश शोध में जुट गए हैं इसका इलाज ढूंढने में और वैक्सीन का निर्माण करने में पर यह प्रक्रिया भी एक निर्धारित समय लेगी। जब तक कोई निश्चित इलाज नहीं प्राप्त हो जाता तब तकबचाव ही कर के रहना होगा। _

उच्च जोखिम समूह - (हाई रिस्क ग्रुप) यह देखा गया कि कोरोना संक्रमण ने हर व्यक्ति को एक ही तरह से प्रभावित नहीं किया।कुछ लोग तो मामूली सर्दी, खांसी के बाद ही ठीक हो गए जबकि कुछ व्यक्ति तो इतनी गंभीर स्थिति में पहुंच गए कि वेंटिलेटर सपोर्ट के बाद भी उनका जीवन बचाया न जा सका एक ही वायरस ने विभिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से असर किया। मरीजों के अध्ययन से यह सामने आया कि जिनकी इम्यूनिटी या रोग प्रतिरोधी क्षमता अच्छी थी वे कोरोना संक्रमण का सामना बेहतर तरीके से कर पाए इसके विपरीत जिनकी रोग प्रतिरोधी क्षमता कमजोर थी वे इस वायरस से बुरी तरह से प्रभावित हुए।ये व्यक्ति उच्च जोखिम समूह के माने गए। और गहराई से अध्ययन से यह पाया गया कि प्रतिरोधी क्षमता में कमी होने के भी कुछ विशेष कारण थे जिसके कारण व्यक्ति विशेष कोरोना संक्रमण का प्रतिकार नहीं कर पाए। उन कारणों में प्रमुख कारण इस प्रकार से थे

1) अधिक उम्रअधिक उम्र कोरोना संक्रमण में जान खोने का एक बहुत बड़ा कारण बन कर सामने आई। हमारे देश में हर दूसरी मृत्यु वरिष्ठ नागरिक की हो रही है। देश में 10%आबादी 60 वर्ष से ऊपर की है। उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर की प्रतिरोधी क्षमता में कमी आ जाती है और साधारणतः बुजुर्ग उच्च रक्तचाप,उच्च शर्करा अथवा किन्हीं अन्य बीमारियों से ग्रसित भी रहते हैं ।यदि वे शारीरिक रूप से बहुत सक्रिय नहीं हैं तो भी समस्या की बात है। ये विभिन्न कारण रोग प्रतिरोधी शक्ति को कमजोर बनाते हैं और यही कमजोर इम्यूनिटी कोरोना वायरस से लड़ने में सफल नहीं हो पाती है

__ ऐसे व्यक्ति जो लंबे समय से दवाइयों पर निर्भर हों जैसे ह्रदय रोग,किडनी रोग, अस्थमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या डाइबिटीज के मरीज प्रायः पूर्णतः दवाइयों पर ही निर्भर रहते हैं। हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार कोरोना से मरने वालों में से 73%लोग पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे। अनुसंधान से यह भी पता चला है कि गंभीर कोरोना वायरस संक्रमण के कारण अस्पताल गए 25% लोगों को मधुमेह था। ये बीमारियाँ कोरोना संक्रमण के खतरे को बढ़ा देती हैं। मधुमेह क्रोनिक किडनी डिसीज का सबसे बड़ा कारण है और ये दोनों बीमारियाँ साथ में इम्यूनिटी को और भी घटा देती हैं

(ट्रांसप्लांट) हुआ है - __(ट्रांसप्लांट) हुआ है - (ट्रांसप्लांट) हुआ है - ___ ऐसे व्यक्ति जिनका कोई भी अंग जैसे किडनी, लिवर का प्रत्यारोपण हुआ है वे व्यक्ति कोरोना संक्रमण के उच्च जोखिम समूह ' में आ जाते हैं। वास्तव में अंग प्रत्यारोपण से समस्या उत्पन्न नहीं होती है बल्कि उसके बाद जो इम्युनो सप्रेसेंट दवाइयाँ दी जाती हैं ताकि शरीर नए प्रत्यारोपित अंग को अस्वीकार न कर दे उससे इम्यूनिटी का स्तर बहुत ही कम हो जाता है और कोई भी इन्फेक्शन होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है

लक्षण विहीन कोरोना कैरियर्स (एसिम्पटेमेटिक)

__ विश्व भर में टेस्टिंग के दौरान यह पाया गया कि बहुत बड़ी संख्या में कोरोना मरीजों में कोई लक्षण ही नहीं पाए गए। जिनके रोग की तीव्रता कम थी वे तो वे स्वयं अपने-आप कुछ दिनों में ठीक हो गए किन्तु जिनके संक्रमण की तीव्रता अधिक थी वे बिना जाने अचानक से गंभीर स्थिति में पहुँच गए। एक और बहुत बड़ी गंभीर स्थिति इससे यह पैदा हुई कि ये लक्षणविहीन कोरोंना मरीज अनजाने में कैरियर बने सामान्य रूप से लोगों के संपर्क में आते रहे। जिससे अनजाने में अन्य व्यक्ति संक्रमित होते रहे विशेषकर कमजोर इम्यूनिटी वाले व्यक्ति उच्च जोखिम समूह को कोरोना संक्रमण से बचने के लिए अपने दैनिक जीवन में कुछ बदलाव करके व कछ कदम उठाकर इससे बचने का प्रयास करना होगा। कोरोना संक्रमण इन व्यक्तियों के लिए दोहरी चुनौती हो जाता है। अपनी नियमित दवाइयां समय पर लेना चाहिए, शुगर लेवल नियंत्रण में रखना चाहिए इसके लिए नियमित जांच करते रहना चाहिए।इसी तरह रक्तचाप भी नियंत्रित रखना आवश्यक है। नियमित समय पर पोषणयुक्त संतुलित भोजन लेना, तले भारी भोज्य पदार्थों से बचना चाहिए।शरीर में पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए। यदि कोई बहुत विशेष चिकित्सकीय परिस्थिति न हो तो हल्की फुल्की एक्सरसाइज जरूर करना चाहिए और हाँ हाथ तो किसी भी काम के पहले व बाद कम से कम बीस सेकंडस के लिए अवश्य धोने चाहिए। घर वालों का सहयोग भी जरूरी है ।वे भी कोई भी वस्तु छूने के बाद, खाना बनाने से पहले हाथों को अच्छे से धोएं। इन सब दैनिक जीवन की सावधानियाँ बरतने के अलावा सबसे जरूरी होगा रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ाना इस उच्च जोखिम समूह की संक्रमण से घिरने का सबसे बड़ा कारण इम्युनिटी का रोगजनित, उम्रजनित, दवाइयों के दुष्प्रभाव अथवा अन्य कारणों से बहुत कम हो जाना है। कुछ ऐसे खाद्य तत्व हैं जिन्हें भोजन, काढ़ा, पाउडर, कैप्सूल, आदि रूप में लिया जा सकता है और रोग प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि की जा सकती है। यही बढ़ी हुई रोग प्रतिरोधी क्षमता कोरोना संक्रमण से बचाव करने में सहयोगी होगी।

मुलेठी (लिकोरिस)

मुलैठी से हम सब भली-भांति परिचित हैं। आयुर्वेद में इसका उपयोग प्राचीन काल से ही व्यापक रूप से होता आ रहा है। औषधीय प्रयोजनों के लिए इस जड़ी बूटी की सूखी जड़ का प्रयोग करते हैं। लीकोरिस रूट यानी मुलैठी को मीठी जड़ के रूप में भी जाना जाता है। इसका इस्तेमाल घाव के उपचार, दमा, मुंह, आँखें, और गले के रोगों के उपचार के लिए सदियों से किया जा रहा है। मुलैठी श्वसन संबंधी समयाओं, सर्दी-खाँसी, कफ, पाचन संबंधी रोगों और यूरिन इन्फेक्शन की समस्या को भी जड़ से खत्म करने के लिए उपयोगी है ।मुलैठी एन्टी-ओक्सिडेंट व एन्टी बायोटिक गुणों से युक्त होती है। इसमें कई पोषक तत्वों व फ्लेवोनोइड्स की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह विटामिन बी और विटामिन ई का एक अच्छा स्त्रोत है। यह फास्फोरस, कैल्शियम, कोलीन, आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सेलेनियम, सिलिकोन एवं जिंक जैसे खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसके अतिरिक्त इसमें कई आवश्यक फाइटोन्यूट्रीएन्ट्स भी पाए जाते हैं। मुलैठी शरीर को वायरस, बैक्टीरिया और संक्रमण से मुक्त रखने के लिए एक मजबूत, स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह लिम्फोसाइटस और मैक्रोफेज जैसे रसायनों के उत्पादन में मदद करती है जो शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली में सुधार लाते हैं। आयुष मंत्रालय मुलैठी को भी कोरोना के इलाज में प्रयोग कर रहा है। इस पर क्लीनिकल ट्रायल भी किया जा रहा है

अदरक अदरक से हर कोई परिचित है। प्राचीन काल से इसका उपयोग एक मसाले और औषधि के रूप में किया जा रहा है यह बहुपयोगी औषधीय गुण आला पदार्थ है। इसको ताजा एवं सुखाकर दोनों प्रकार से उपयोग में लाया जाता है। आयुर्वेद में अदरक को सबसे महत्वपूर्ण बूटियों में से एक माना गया है। यहाँ तक कि उसे अपने आप में औषधियों का पूरा खजाना बताया गया है। इसके पोषक तत्व शरीर के सभी हिस्सों तक आसानी से पहुँच पाते हैं। अदरक कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में सक्षम है,ह्रदय के लिए फायदेमंद ,मधुमेह से बचाव और उपचार में उपयोगी,मोशन सिकनेस में कमी लाता है,जोड़ों के दर्द में फायदेमंद और बहुत उत्तम पाचक है। अदरक अपने शक्तिशाली एन्टी ओक्सिडेंट और एन्टी इन्फ्लेमेट्री गुणों के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती प्रदान करता है। इसमें दर्द निवारक तत्व भी होते हैं ।ऊपरी श्वसन मार्ग के संक्रमण में आराम पहुँचाने के कारण यह सर्दीखाँसी,खराब गले और ब्रोंकाइटिस में भी अच्छा प्रभाव दिखाता हैअदरक के शक्तिशाली एन्टी ओक्सिडेंट लिपिड पेरोक्सिडेशन व डी एन ए क्षति को रोकते हैं साथ ही फ्री रेडिकल्स से सुरक्षा प्रदान करते

हल्दी (कुकुमिन)

हल्दी का उपयोग 2,500 वर्षों से खाना पकाने एवं घरेलू चिकित्सा में किया जा रहा है। हल्दी हमें अदरक के परिवार में पाए जाने वाले पत्तेदार पौधे की जड़ जिसे 'कुरकुमा लोंगा' कहते हैं से प्राप्त होती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है 'कुर्कुमिन' यह पेड़ पौधों से उत्पन्न एक रासायनिक यौगिक हैइसके 6 मूल औषधीय गुण हैं - (1)एन्टी-इन्फ्लेमेट्री (2) एन्टी-ओक्सिडेंट (3) एन्टी-वायरल (4) एन्टी-बैक्टीरियल (5) एन्टी-फंगल (6) एन्टी-कैंसर हल्दी के इन्हीं गुणों के कारण इस पर अनेकों अनुसंधान हो रहे हैं। ___ कुर्कुमिन में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के गुण मौजूद हैं। यह प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में सुधार लाता है ताकि अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया से शरीर की रक्षा हो सके। ब्रोंकल समस्याएं वास्तव में प्रतिरक्षा प्रणाली की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया से उत्पन्न होती हैं, कुर्कुमिन इन प्रतिक्रियाओं में तालमेल बैठा कर तुरंत राहत दिलाती है। हल्दी से सर्दी-खाँसी, साँस लेने संबंधी बीमारियाँ, ऊपरी श्वसन पथ में संक्रमण या इससे संबंधित बीमारियाँ, वायरल बुखार जैसी अनेकों समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। इस प्रकार हल्दी प्रतिरक्षा प्रणाली को बहुत सपोर्ट देती है।

बोस्वेलिया (सलाई गुग्गुल) -

बोस्वेलिया सेराटा जिसे हिन्दी में गुग्गुल या लोबान कहते हैं लंबे समय से एक लोकप्रिय जडीबटी के रूप में जाना जाता रहा है। यह एक मध्यम आकार का पेड़ है जिसके पत्ते नीम के पौधे की तरह होते हैं इससे प्राप्त होने वाला गोंद ही औषधि के रूप में उपयोग होता है। इसका उपयोग बहुत प्राचीन समय से गठिया, दर्द और सूजन के लिए औषधि रूप में होता आया है। इसके अतिरिक्त त्वचा के लिए, आंतो की सूजन के लिए, कोलेस्ट्राल स्तर नियंत्रित करने के लिए, कैंसर, तनाव, सरदर्द व मधुमेह बचाव एवं उपचार में होता रहा आया है। इसके एन्टी इन्फ्लेमेट्री प्रभाव इन्फ्लेमेशन कम करने में सहायक होते हैं ।इन्फ्लेमेशन नियंत्रण से क्रोनिक समस्याओं के निदान में सहायता मिलती है

कालमेघ -

कालमेघ भारत, श्रीलंका, बांगला देश, पाकिस्तान व अन्य दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में बहुतायत से पाया जाता हैयह एक औषधीय पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम एंडोग्रेफिस पैनिकुलाटा है। कालमेघ की पत्तियों में कालमेघीन नामक उपाक्षार पाया जाता है। जिसका औषधीय महत्व है। इस पौधे का हर हिस्सा बेहद कड़वा होता है। इससे कड़वा टॉनिक या काढ़ा तैयार होता है। तमिलनाडु में इससे बने काढ़े को नीलवेम्ब काषायम कहते हैं। कोविड 19 के शुरूआती दिनों में तमिलनाडु में सबको रोग प्रतिरोधी शक्ति बढाने के लिए नीलवेम्बू काषायम पिलाया जा रहा था। कालमेघ औषधीय गुणों से भरपूर छोटा सा पौधा हैइसको छाया में सुखा कर इसका चूर्ण बनाकर उपयोग में लेते हैं। वायरल बुखार में लिवर प्रभावित होता है, ऐसे में कालमेघ लिवर सुरक्षा करता है। डेंग, चिकनगुनिया या अन्य बुखार में भी यह लाभकारी है। कालमेघ में एन्टी वायरल व एन्टी बैक्टीरियल गुण होते हैं जो प्रतिरक्षा को बढ़ावा देते हैं। कुल मिलाकर यह स्वास्थ्य बुस्टर के रूप में कार्य करता है। शरीर की ताकत के साथ ही जीवन रक्षक शक्ति को बढ़ाता है और सामान्य कमजोरी के खिलाफ भी कार्य करता है।

एल्डरबेरी ये गहरे बैंगनी, काले रंग की बेरीज मूलतः यूरोप से हैं परन्तु अब दुनिया के कई हिस्सों में मिलती निवास हैं।ये एन्टी ओक्सिडेंट्स से भरपूर कम कैलोरी के फल हैं ।इनके अनेकों पोषण लाभ हैं।एल्डरबेरी विटामिन सी,फाइबर से भरपूर होती हैइसके फूल,फल और पत्तियां एन्टी ओक्सिडेंट्स का बहुत ही उत्तम स्त्रोत हैं। इसके अनेकों स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं जैसे ह्रदय सुरक्षा,कैंसर से बचाव,मूत्रवर्धक,वश् रेडिएशन से बचाव इत्यादि। ये हानिकारक बैक्टीरिया से लडती हैं और सायनस व लिए ब्रोंकाइटीस के लक्षणों में कमी लाती है। सर्दी एवं इन्फ्लुएंजा के लिए भी लाभकारी होती है। इसमें पाए जाने वाले विटामिन्स एवं एन्टी ओक्सिडेंट्स रोग इम्यून सिस्टम को बहुत फायदा पहुंचाते हैं और साथ ही इन्फ्लेमेशन को रोकने में भी मदद करते हैं

आउँमिसिया - यह एक पौधा होता है और इससे चीन में प्राचीन काल से ज्वर के लिए पारंपरिक हर्बल दवाइयां बनाई जाती रही हैं। इसका प्रमुख तत्व आर्टेमिसिनिन को अन्य तत्वों के साथ मिलाकर मलेरिया के उपचार के , लिए दवा तैयार की जो कि मलेरिया के इलाज में बहुत सफल रही। इसके अनेकों अन्य स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं जैसे लिवर का शोधन, शारीरिक एवं मानसिक थकान दूर करना, नर्वस सिस्टम का नियमन करना, श्वसन संस्थान की कार्यक्षमता में बढ़ावा; यह ब्रोंकाइटीस के पौधे उपचार में भी प्रभावकारी पाया गया है। और सबसे बढ़कर इसमें रोगप्रतिकारात्मक गुण पाए जाते हैं जो इम्यून सिस्टम को मजबूती प्रदान करते हैं। आर्टेमिसिया हर तरह के वायरस से लड़ने में सक्षम है और सर्दी व फ़्लू के लक्षणों में बहुत कमी ला सकता है। । उच्च जोखिम समूह को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए सबसे सुखा आवश्यक रोग प्रतिरोधी शक्ति अथवा इम्यूनिटी को बढ़ाना है जो कि विभिन्न कारणों से उस समूह में कम हो जाती है। जिसके कारण संक्रमण की संभावना भी बढ़ती है और उसके गंभीर रूप ले लेने की भी। दवाइयों के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जो इम्यूनिटी को और । कमजोर बनाते हैं।। उपरोक्त लिखित सारे तत्व पूर्ण रूप से प्राकृतिक हैं जो शरीर को नैचुरली मजबूती प्रदान करेंगे बिना किसी साइड इफेक्ट के और कोरोना संक्रमण से लड़ने में सक्षम बनायेंगे। इसके अतिरिक्त योग और ध्यान को भी जीवन का एक अनिवार्य अंग बनाना आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत आवश्यक है।

रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ाने वाले निवास विटामिन्स एवं मिनरल्स 1) विटामिन C - एस्कोर्बिक एसिड या विटामिन C जल में घुलनशील विटामिन है। स्ट्रांग इम्यून सिस्टम के लिए इसकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। चूंकि हमारा शरीर विटामिन C का निर्माण स्वयं नहीं कर पाता है तो इसकी पूर्ति दैनिक जीवन में ग्रहण किये हुए आहार से होती है। विटामिन C अनेकों प्रकार से प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाने में मददगार १ है उनमें से एक है एन्टीबॉडीज का निर्माण एवं उनके क्रियाकलाप में ' सहयोग देना। एक अच्छा एन्टीबॉडी फंक्शन एक हेल्दी इम्यून सिस्टम के लिए महत्त्वपर्ण है। विटामिन C के अनेकों स्त्रोत हैं। अनेको फल एवं सब्जियों से यह प्राप्त हो सकता है जैसे खट्टे फल, संतरा, नीबू, _ टमाटर स्ट्राबेरी, हरी व लाल शिमला मिर्च, कीवी इत्यादि।

2) विटामिन D विटामिन D एक फैट : ___ विटामिन D एक फैट में घुलनशील विटामिन VITAMIN है जो कि शरीर के लिए अनेकों महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है विशेषतः प्रतिरक्षा तंत्र स्वास्थ्य के लिए विटामिन D इम्यून सिस्टम के भली प्रकार से कार्य करने के लिए अत्यंत ही आवश्यक है जो कि किसी भी बीमारी या इन्फेक्शन के प्रति शरीर की पहली सुरक्षा रेखा है। यह विटामिन प्रतिरोधी प्रतिक्रिया प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण है साथ ही साथ प्रतिरक्षा तंत्र के सुरक्षात्मक व्यवहार को गतिशील करने के लिए भी विटामिन D इम्यून सेल्स व टी सेल्स की कार्यक्षमता बढाता है जो शरीर को पैथोजन्स से सुरक्षित रखते हैं। सूर्य के संपर्क में आते ही विटामिन D त्वचा द्वारा स्वाभाविक रूप से बनने लगता है। खाद्य पदार्थों में विटामिन D3 दूध एवं अन्य डेरी पदार्थ, अंडे, मछली और मीट से मिलता है इसके अतिरिक्त सप्लीमेंट द्वारा भी लिया जा सकता है।

3) जिक जिंक शरीर के अनेकों स्वास्थ्य लाभों के Zinc लिए आवश्यक है जिनमें से मुख्य हैं, विकास, DNA सिंथेसिस एवं इम्यून सिस्टम फंक्शन। चेलेटेड जिंक साधारण जिंक की बजाय शरीर में अधिक बेहतर तरीके से अवशोषित होता है। जिंक साधारण विकास और स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। जो लोग अपने आहार से पर्याप्त मात्रा में जिंक नहीं ग्रहण कर पाते या जिन्हें विभिन्न कारणों से और अधिक जिंक की आवश्यकता है उनके लिए जिंक सप्लीमेंट आवश्यक हो जाते हैं। जिंक की सामान्य कमी भी प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करती है जिससे कई बीमारियों की संभावना बढ़ जाती । अच्छी बात यह है कि जिंक की कमी को सप्लीमेंट देकर परा किया सकता है। एक अध्ययन के दौरान वृद्ध लोगों में जिंक सप्लीमेंट देने इम्यूनिटी में उल्लेखनीय सुधार हुआ और इन्फ्लेमेट्री रेस्पोंस में कमी पाई गई।

4) सेलेनियम सेलेनियम एक एसेंशियल ट्रेस मिनरल है। यह संज्ञानात्मक क्रिया-कलाप,थायरोइड . समस्याओं,ह्रदय संबंधी बीमारियों,कैंसर एवं प्रजनन संबंधी समस्याओं से बचाव में सहायक होता है। सेलेनियम इम्यून सिस्टम के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह ओक्सिडेंट शरीर में ओक्सीडेटिव स्ट्रेस घटाने में मददगार होता है। जिससे इन्फ्ले मेशन कम होता है और इम्युनिटी बढ़ती है। शोध इस ओर इंगित करते हैं कि रक्त में बढ़े हुए सेलेनियम स्तर बढ़े हुए इम्यून रेस्पोंस से सम्बद्ध हैंदूसरी तरफ सेलेनियम की कमी इम्यून सेल फंक्शन को नुक्सान पहुंचाती है जिससे इम्यून रेस्पोंस धीमा हो जाता है। अंडे, चिकन टना मछली डेरी उत्पाद एवं ब्राजील नट सेलेनियम के अच्छे मोत हैं

रोग प्रतिरोधी शक्ति बढाने । वाले अन्य तत्व

1) कोलोस्ट्रम (गोजातीय) किसी भी स्तनधारी द्वारा नवजात को जन्म देने के तरंत बाट जो टध जैसा तरल पदार्थ दध की जगह निकलता है उसे कोलोस्ट्रम कहते हैं। गाय के थन से भी बछड़े को जन्म देने के बाद कुछ दिनों तक यह तरल पदार्थ निकलता है, जब तक कि असली दूध न आने लगे। इसे गोजातीय (Bovine) कोलोस्ट्रम कहते हैं। इसमें प्रोटीन, कर्बोज, फैट, विटामिन्स, मिनरल्स एवं विशेष प्रकार के प्रोटीन्स जिन्हें एन्टीबॉडीज कहते हैं।ये एन्टीबॉडीज बीमारी पैदा करने वाले कारकों जैसे बैक्टीरिया या वाडरस से लड़ने में सक्षम होती हैं। गोजातीय कोलोस्ट्रम 106 एवं 1GM एन्टीबॉडीज युक्त होता है। ये इम्यून प्रतिक्रियाओं का नियमन भी करती हैं। शोधों द्वारा कोलोस्ट्रम के उपयोग से अपर रेस्पीरेटरी इन्फेक्शन के लक्षणों की रिस्क कम पाई गई। किये हुए अध्ययन यही संकेत देते हैं कि गोजातीय कोलोस्टम इम्यूनिटी बढाता है, इन्फेक्शन से लड़ता है साथ ही गट हेल्थ के लिए लाभकारी है।

प्रोबायोटिक्स - प्रोबायोटिक्स को पहले सिर्फ पेट के स्वास्थ्य से संबंधित समझा जाता था किन्तु आजकल जितने भी शोध हो रहे हैं वे गट हेल्थ को स्वास्थ्य के हर पहलू से जुडा हुआ पा रहे हैं, इम्युनिटी के साथ भी। प्रोबायोटिक्स वे जीवित बैक्टीरिया हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं मुख्यतः पाचन तंत्र के लिए। मुख्यतः दो प्रकार के प्रोबायोटिक्स का सबसे ज्यादा उपयोग होता है एवं अनुसंधान भी सबसे ज्यादा इन्हीं पर हुए हैंA) लैक्टोबैसिलस B) बाईफिडोबैक्टीरिया -किसी भी मिश्रित प्रोबायोटिक में इनकी उपस्थिति को L एवं B लिखकर दिखाते हैं। ये बैक्टीरिया खराब बैक्टीरिया की जनसँख्या को नियंत्रित करते हैं,मांसपेशियों को उर्जा प्रदान करने में सहायक,शरीर को मिनरल्स अवशोषित करने में मदद,न्यूट्रीएन्ट्स को इस तरह विभाजित करते हैं कि शरीर उपयोग कर सके। अप्रत्यक्ष रूप से प्रोबायोटिक्स शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ताकतवर बनाने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। दही, छाछ,अचार भारतीय खाने में प्रोबायोटिक्स के बहुत अच्छे उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त केफिर, मिसो, किमची, कोम्बुचा विश्व के अन्य भागों में भोजन का अंग।

3) गैनोडर्मा मशरूम - इसे रीषी मशरूम के नाम से भी जाना जाता है।एशियन देशों में १. इनका चिकित्सकीय रूप से उपयोग सैंकड़ों वर्षों से किया जा रहा है। पहले इनका उपयोग मुख्यतः इन्फेक्शन का इलाज करने के लिए ही किया जाता था किन्तु आजकल श्वांस से संबंधित बीमारियों में व कैंसर के इलाज में भी हो रहा है। उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोग,लिवर एवं किडनी रोग, अत्यधिक थकान की समस्याओं के लिए भी।ताकत एवं स्टेमिना विकसित करने के लिए साथ ही साथ प्रतिरोधी शक्ति को बढाने के लिए गैनोडर्मा का महत्व है। यह शक्ति इनमें पाए जाने वाले उच्च न्यूट्रीएन्ट्स जैसे विटामिन-बी, विटामिन-डी, सेलेनियम, नायसिन, इसके अतिरिक्त आठ में से सात आवश्यक एमिनो एसिड के कारण होती है। गैनोडर्मा में मौजूद एन्टी ओक्सिडेन्ट्स हमें फ्री रेडिकल्स से बचाने का कार्य करते हैं। इसको ग्रहण करने से शरीर में विषाणुरोधी क्षमता और शरीर में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है जो कि कोशिकाओं को रिपेयर करता है। यह एक प्राकृतिक एन्टी बायोटिक है जो कि माइक्रोबियल और अन्य फंगल संक्रमण को ठीक करता हैगैनोडर्मा मशरूम को पाउडर, तरल या कैप्सूल के रूप में लिया जा सकता है।