Lenin Media | गिलगित-बल्तिस्तान के बहाने पाक की बड़ी साजिश | Article by सर्वेश तिवारी
 
 
 
Article | सर्वेश तिवारी

गिलगित-बल्तिस्तान के बहाने पाक की बड़ी साजिश


पाकिस्तान की तरफ से गिलगित बल्तिस्तान को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की तैयारी से भारत- पाकिस्तान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। भारत ने जहाँ कड़ा ऐतराज जताया है वहीं पकिस्तान इसे अपना मामला बता रहा है। पाकिस्तान के एक मंत्री ने साफ़ कर दिया है कि इमरान सरकार गिलगित बल्तिस्तान को पूर्ण राज्य का दर्जा देने वाली है और उसे दूसरे प्रांतो की तरह सभी संवैधानिक अधिकार दिए जाएंगे। अभी तक पाकिस्तान इस इलाके को सूबे का दर्जा देने से बचता रहा है और कहता रहा है कि उसका भविष्य कश्मीर समस्या के समाधान पर निर्भर करता है। लेकिन अचानक लिए गए इस फैसले को पाकिस्तान की गहरी साजिश के रूप में देखा जा रहा है। इसकी एक वजह गिलगित बल्तिस्तान में होने वाले चुनाव भी हो सकते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि चुनावी फायदे के लिए इमरान सरकार ने नया पैंतरा चला हो। भारत के लिए अहम गिलगित बल्तिस्तान तकनीकी रूप से जम्मू कश्मीर का इलाका है, लेकिन 4 नवंबर 1947 से पाकिस्तान के कब्ज़े में है।

गिलगित बल्तिस्तान चीन -पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का दरवाजा है। जानकारों की माने तो पाकिस्तान इसे अलग प्रान्त बनाकर बड़े फायदे की फ़िराक में है, लेकिन उसे इसकी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ सकती है क्योंकि वहां की बड़ी आबादी इस पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों का हवाला देते हुए वहाँ जनमत संग्रह कराए जाने की मांग करता रहा है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भारत में उसका विलय क़ानूनी है। इस नाते गिलगित और बल्तिस्तान भी उसके हैं। यही वजह है कि भारत ने गिलगित बल्तिस्तान में चुनाव कराए जाने को मंज़ूरी देने के पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना था कि पाकिस्तान को चुनाव कराने की बजाए गिलगित और बल्तिस्तान को तुरंत ख़ाली करना चाहिए। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था कि वहां चुनाव कराने का पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है।

दरअसल ये इलाका भी भारत से साजिश के तहत चला गया। अंग्रेज़ों ने जम्मू कश्मीर के महाराज से लीज़ पर इसे ले रखा था। ताकि यहां की उंची पहाड़ियों से आस-पास के पूरे इलाके पर नज़र रखी जा सके। ‘गिलगित स्काउट्स’ नाम की एक फोर्स यहां तैनात रहती थी। अंग्रेज़ जब भारत से जाने लगे तो लीज़ खत्म कर ये इलाका महाराज को लौटा दिया गया। महाराज ने ब्रिगेडियर घंसार सिंह को यहां का गर्वनर बना दिया। महाराज को गिलगित स्काउट्स के जवान भी मिले, जिनके अफसर अंग्रेज़ होते थे। मेजर डब्लयू. ए. ब्राउन और कैप्टन ए. एस. मैथीसन महाराज के हिस्से आई फौज के अफसर थे। जब पाकिस्तान के कबायली लोगों की आड़ में पाकिस्तानी फौज ने जम्मू कश्मीर पर हमला किया, महाराज ने अपना राज्य भारत में मिला दिया। 31 अक्टूबर को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर दस्तखत हुए और गिलगित-बल्तिस्तान हिंदुस्तान का इलाका बन गया। लेकिन मेजर डब्लयू. ए. ब्राउन ने महाराज से गद्दारी की और ब्रिगेडियर घंसार सिंह को जेल में डालकर पेशावर में अपने अंग्रेज सीनियर लेफ्टिनेंट कर्नल रौजर बेकन को खबर की कि गिलगित पाकिस्तान का हिस्सा बनने जा रहा है। 2 नवंबर को ब्राउन ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया। इसके दो हफ्ते बाद पाकिस्तान सरकार की तरफ से सदर मोहम्मद आलम गिलगित के पॉलिटिकल एजेंट बनाए गए। इस तरह एक अंग्रेज अफसर की गद्दारी से गिलगित-बल्तिस्तान पाकिस्तान का इलाका बन गया।

मौजूदा हालत में गिलगित बल्तिस्तान को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पीछे चीन का हाथ भी माना जा रहा है। चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर गिलगित-बल्तिस्तान से गुजर रहा है। चीन नहीं चाहता कि उसकी परियोजना ऐसे इलाके से निकले जिसे लेकर किसी तरह का विवाद हो। भारत इस परियोजना पर अपना विरोध भी जता चुका है। इसलिए पाकिस्तान इलाके को विवादों से दूर ले जाना चाहता है ताकि परियोजना चलती रहे। गिलगित-बल्तिस्तान को जम्मू कश्मीर से अलग, पाकिस्तान का एक राज्य बनाने से चीन की राह आसान हो जाएगी। चीन दरअसल पाकिस्तान के रास्ते अपना फायदा पूरा करता रहा है। ग्वादर में जो उसने पोर्ट बनाया है उसके पीछे भी वही मंशा है।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के तटीय कस्बे ग्वादर और इसके आसपास के इलाके को 1958 में पाकिस्तान सरकार ने ओमान से ख़रीदा था। इस तटीय क्षेत्र के एक बड़े बंदरगाह बनने की संभावनाओं की बात उस समय शुरू हुई जब 1954 में एक अमरीकी भूगर्भ सर्वेक्षण में ग्वादर को डीप सी पोर्ट के लिए एक बेहतरीन स्थान बताया गया। तब से ग्वादर को बंदरगाह के रूप में विकसित करने की बातें तो होती रहीं लेकिन ज़मीन पर काम दशकों बाद साल 2002 में शुरू हुआ।

ग्वादर बंदरगाह पहली बार विवाद और संदेह की चपेट में तब आया जब 2013 में पाकिस्तान सरकार ने इस बंदरगाह को चलाने का ठेका सिंगापुर की कंपनी से लेकर एक चीनी कंपनी के हवाले कर दिया। विशेषज्ञ इस मामले की पारदर्शिता पर आज भी सवाल उठाते हैं। यह वह दौर था जब पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर चीनी निवेश की बातें सामने आने लगीं। इसी दौरान नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में बनने वाली सरकार ने घोषणा की कि चीनी सरकार ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर के निवेश का इरादा जताया है। इस परियोजना को चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर का नाम दिया गया है जिसके तहत चीन को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने की योजना है।

भारत में जब भी चीन और पाकिस्तान की एक साथ बात होती है तो ग्वादर पोर्ट का जिक्र जरूर होता है। चीन पाकिस्तान के इस बंदरगाह को आर्थिक गलियारे की अपनी नीति के तहत विकसित कर रहा है। जानकार कहते हैं कि भारत को घेरने की चीनी नीति में ग्वादर का अहम रोल है। ग्वादर पोर्ट की भौगोलिक स्थिति भारत को घेरने के लिए एकदम मुफीद है। लेकिन भारत वहां से 170 किलोमीटर दूर ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है। भारत के इस कदम को ग्वादर पर चीन के कदम का काउंटर माना जाता है। लेकिन ग्वादर 1958 तक पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था। कहा जाता है कि भारत की थोड़ी सी रणनीतिक चूक से ग्वादर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

जानकारों कि माने तो पाकिस्तान को इसे देने से पहले ओमान के सुल्तान ने ग्वादर के इलाके को भारत को सौंपने या बेचने की इच्छा जताई थी। लेकिन भारत सरकार का मानना था कि भारत से लगभग 700 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक जगह को पाकिस्तान से बचाए रखना मुश्किल काम होगा। इसलिए ओमान ने पाकिस्तान को ग्वादर पोर्ट बेच दिया। हालांकि पाकिस्तान जल्दी इस पोर्ट पर ज्यादा कुछ नहीं कर सका। पाकिस्तान ने 1993 में इस पोर्ट को काम में लेना शुरू किया। इलाके का तेज विकास 2002 से शुरू हुआ जब ग्वादर से कराची हाइवे बनने की शुरुआत हुई। ओमान कि तरफ से पाकिस्तान को ग्वादर दिए जाने के पीछे कहानी का दावा तो नहीं किया जा सकता है, लेकिन ये तय है कि ग्वादर पोर्ट या गिलगित बल्तिस्तान के बहाने चीन भी बड़ी साजिश रच रहा है जिसका अंत पाकिस्तान के लिए भी बुरा होगा।

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